लघुकथा

प्रतिरोध

हाथियों, तेंदुओं, भेड़िए, जहरीले साँपों तथा अन्य जंगली जानवरों का आतंक दिनों दिन बढ़ता चला जा रहा था। वहाँ अस्थायी कैंप लगाए हुए मजदूर, आसपास के गाँव वाले भी हलकान थे। कब कौन किसी जंगली जानवर का शिकार हो जाएगा या कौन सा दिन उनका अंतिम दिन बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता था। जंगल कटाई के सुपरवाइजर की गाड़ी को भी जंगली हाथियों ने खदेड़ा, बड़ी मुश्किल से गाड़ी की गति बढ़ाकर उसने जान बचाई। कटते हुए पेड़ों पर जाने कितने ही पक्षियों के घोंसले थे, जब कोई पेड़ कट कर गिरता, पक्षी अपने अंडों-बच्चों की चिंता में चीखने-चिल्लाने लगते।

मजदूरों को अच्छा नहीं लगता पर कहते, “हमारी रोजी-रोटी, देश की तरक्की का भी सवाल है। यहाँ पर किसी उद्योगपति का भारी-भरकम प्रोजेक्ट लगने वाला है। सरकार क्या करे, कटवाना ही पड़ेगा। पर्यावरण वालों ने भी हद्द कर दी है, जब देखो झंडे-बैनर लेकर जंगल में घुसे चले जाते हैं और जंगल की कटाई में व्यवधान डालते हैं। अब हम जंगली जानवरों से खुद को सुरक्षित रखें यह इनके तीखे नारों से? ओऽह!” इसके बाद उनके शब्द चुक गए। उनके सोच की हद यहीं खत्म होती थी।

जैसे-जैसे जंगल कटाई का कार्यक्रम आगे बढ़ता गया, स्थिति गंभीर होने लगी। जंगली हाथियों ने कटाई मजदूरों के अस्थायी कैंपों सहित आसपास के गाँवों के मकान ढहा दिए, खेत खलिहान कुचल दिए। जंगली तेंदुआ और भेड़िए छोटे बच्चों को शिकार बनाने‌ लगे। साँप घरों में घुसने लगे और घरों के छज्जों पर अपना आशियाना तलाशने लगे। जंगली बिल्लियाँ खाने की तलाश में रसोईघरों में घुसपैठ करने लगीं। बायसन सड़कों पर खड़े मिलते और ट्रैफिक रुक जाता। जंगली जानवर कभी किसी का रास्ता रोकते, कभी दूर तक खदेड़ते। हाथी गाड़ियों को कुचलने का भी प्रयास करते। जंगली जानवरों का गुस्सा साफ दिखने लगा था। इंसान हो या बेजुबान जानवर, घर किसी का भी टूटे, वह शक्ति भर विरोध करता है। जंगल जैसे-जैसे कटते जा रहे थे, उनके निवास स्थान सिमटते जा रहे थे। इंसानों से रार ठनना तो बनता था।

विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण वालों के भारी विरोध के कारण सरकार दवाब में दिख रही थी। पार्टी के अंदर से भी कुछ लोग इस बात का विरोध कर रहे थे। इच्छा होते हुए भी सरकार अपना फैसला नहीं बदल पाई, क्योंकि पार्टी को मिले चंदे से चुनावों का खर्च निकालना जो था। चुनाव में धनलक्ष्मी शक्कर के समान होती है, जितना शक्कर घोलोगे, जीत की राह मीठी और सुगम होगी। जंगलों का क्या है, फिर से उग आयेंगे। लोगों का क्या है, कुछ तो लोग कहेंगे, उनका काम है कहना। चुप कराने के लिये कुछ सरकारी पेड़ लगा दिए जाएँगे। विरोध करते लोगों को पुलिस प्रशासन बल प्रयोग कर निपटा देगी। हमने ठेका थोड़े ही ले रखा है जंगलों की सुरक्षा का। हमारा काम है, अपनी पार्टी की सरकार को दीर्घकाल तक बचाए रखना। पब्लिक चीखेगी, चिल्लाएगी फिर जीवन के कश्मकश में भूल जाएगी। कितने ही तो जंगल कट गए, आमजन आज तक क्या कर पाए हैं।

सच ही था, अन्य उजाड़े गये वनों की तरह यह खबर भी जल्द ही भुला दी गई।

— नीना सिन्हा

नीना सिन्हा

जन्मतिथि : 29 अप्रैल जन्मस्थान : पटना, बिहार शिक्षा- पटना साइंस कॉलेज, पटना विश्वविद्यालय से जंतु विज्ञान में स्नातकोत्तर। साहित्य संबंधित-पिछले दो वर्षों से देश के समाचार पत्रों एवं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लघुकथायें अनवरत प्रकाशित, जैसे वीणा, कथाबिंब, सोच-विचार पत्रिका, विश्व गाथा पत्रिका- गुजरात, पुरवाई-यूके , प्रणाम पर्यटन, साहित्यांजलि प्रभा- प्रयागराज, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस-मथुरा, सुरभि सलोनी- मुंबई, अरण्य वाणी-पलामू,झारखंड, ,आलोक पर्व, सच की दस्तक, प्रखर गूँज साहित्य नामा, संगिनी- गुजरात, समयानुकूल-उत्तर प्रदेश, शबरी - तमिलनाडु, भाग्य दर्पण- लखीमपुर खीरी, मुस्कान पत्रिका- मुंबई, पंखुरी- उत्तराखंड, नव साहित्य त्रिवेणी- कोलकाता, हिंदी अब्राड, हम हिंदुस्तानी-यूएसए, मधुरिमा, रूपायन, साहित्यिक पुनर्नवा भोपाल, पंजाब केसरी, राजस्थान पत्रिका, डेली हिंदी मिलाप-हैदराबाद, हरिभूमि-रोहतक, दैनिक भास्कर-सतना, दैनिक जनवाणी- मेरठ, साहित्य सांदीपनि- उज्जैन ,इत्यादि। वर्तमान पता: श्री अशोक कुमार, ई-3/101, अक्षरा स्विस कोर्ट 105-106, नबलिया पारा रोड बारिशा, कोलकाता - 700008 पश्चिम बंगाल ई-मेल : maurya.swadeshi@gmail.com व्हाट्सएप नंबर : 6290273367

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