बुढ़ापे की लाचारी और कमज़ोर होते जिस्म ने उनकी हिम्मत को और तोड़ दिया था।
शाम का वक्त था। बाहर हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी और लिविंग रूम में दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक के अलावा पूरे घर में एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था।
कभी इस घर में मास्टर दीवान चंद की धाक हुआ करती थी। उनके घर में क़दम रखते ही बेटा आलोक चुपचाप अपनी किताबों में सिर गड़ा देता था। वह दौर दूसरा था, जब पिता की एक सख्त निगाह भर से आलोक की रूह काँप जाती थी। वक्त ने करवट ली, साल बीते और आलोक बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया। फ़िर उसकी शादी हुई, घर में बहू आ गई, और आहिस्ता-आहिस्ता घर की चौखट के सारे फ़ैसले और अधिकार आलोक और उसकी पत्नी के हाथों में चले गए।
अब हालात यह हो चुके थे कि मास्टर दीवान चंद अपने ही घर में किसी बेगाने मेहमान की तरह कोने में सिमट कर रह गए थे। वे अब अपने ही बेटे और बहू से डरने लगे थे। मुँह से कोई भी बात निकालने से पहले वे मन ही मन दस बार तौलते थे,कहीं आलोक को बुरा न लग जाए, कहीं बहू के तेवर न बदल जाएं। उनकी हँसी तो जैसे कहीं खो गई थी, और उनकी आवाज़ हमेशा दबी-दबी और बेहद सतर्क रहती थी। बुढ़ापे की लाचारी और कमज़ोर होते जिस्म ने उनकी हिम्मत को और तोड़ दिया था।
रात के करीब बारह बज रहे थे। आलोक की आँख खुली तो उसे किचन की तरफ़ से बर्तनों के खटकने की बहुत धीमी सी आवाज़ सुनाई दी। वह चौंककर उठा। दबे पाँव अंधेरे में चलते हुए वह किचन के दरवाज़े तक पहुँचा और भीतर का नज़ारा देखकर उसका कलेजा मुँह को आ गया।
मास्टर दीवान चंद बहुत ही सहमे और डरे हुए अंदाज़ में खड़े थे। उनके हाथ में चीनी का एक पुराना डिब्बा था। वे ऐसे फूँक-फूँक कर क़दम रख रहे थे और डिब्बे का ढक्कन इतनी एहतियात से खोल रहे थे, जैसे कोई शातिर चोर किसी के घर में सेंध लगा रहा हो। उन्हें रात में अक्सर मीठा खाने की हल्की सी तलब लगती थी, पर आज डिब्बे में से एक छोटा सा गुड़ का टुकड़ा निकालते हुए उनके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे।
तभी आहट पाकर वे पलटे और सामने आलोक को खड़ा देख कर इस तरह बुरी तरह घबरा गए कि उनके हाथ से गुड़ का टुकड़ा छूटकर फर्श पर गिर पड़ा।
घिग्घी बँधी और काँपती हुई आवाज़ में वे सफ़ाई देने लगे—”क… कुछ नहीं बेटा, बस… बस जरा सा गुड़ खाना था, मुँह में कड़वाहट सी हो रही थी… सोचा तुझे जगाऊँ नहीं, तू दिन भर का थका-माँदा ऑफिस से आया है…”
आलोक की ज़बान पर जैसे ताला लग गया। उसका गला रुँध गया और उसकी आँखें बेइख़्तियार छलक आईं।
वह पिता, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी छाती पर पत्थर रखकर उस बेटे को हर ख़ुशी दी, जिसके आगे कभी कोई कमी नहीं आने दी, आज वही पिता अपने ही बनाए घर में, अपने ही घर की तिजोरी या डिब्बे से एक टुकड़ा गुड़ निकालने के लिए चोरों जैसी लाचारी महसूस कर रहा था!
आलोक से और देखा नहीं गया। उसने झटपट आगे बढ़कर अपने काँपते हुए पिता को सीने से लगा लिया और बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो पड़ा। उसे समझ आ गया कि वक्त ने बुढ़ापे को कितना बेबस और लाचार बना दिया है, और इस खौफ़ की दीवार किसी और ने नहीं, बल्कि घर के बदलते हुए बेपरवाह माहौल ने खड़ी की थी।
आलोक की बाहों में सिमटे मास्टर दीवान चंद कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गए। उनके कमज़ोर और झुर्रियों से भरे कंधों पर जब बेटे के आँसुओं की गर्माहट पड़ी, तो उनका अंदर तक का बाँध टूट गया। वे जो बरसों से अपने ही घर में अजनबी बने घूम रहे थे, उस कड़कैत ठंड में भी जैसे पिघल गए।
उन्होंने अपने काँपते हुए हाथों से आलोक की पीठ थपथपाई, ठीक वैसे ही जैसे दशकों पहले वे छोटे से आलोक को सुलाया करते थे।
दीवान चंद की आँखें भी छलक आईं, मगर उन आँसुओं में डर नहीं, एक अजीब सा सुकून था,”पागल… तू क्यों रोता है बेटा? बाप से डरता थोड़ी कोई है… बस, वक्त का फ़ेर है। मुझे लगा कहीं तेरी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में मेरी ये छोटी-छोटी ज़रूरतें तुम्हारे लिए बोझ न बन जाएँ… बहू और बच्चों के बीच तुझे परेशानी न हो…”
आलोक का दिल यह सुनकर और भी ज़्यादा छलनी हो गया। उसने अपनी गिड़गिड़ाती हुई आवाज़ में कहा, “पापा, आप पर कोई बोझ नहीं हैं… बोझ तो मेरा यह घमंड और मेरी ये बेपरवाही हो गई थी जो मैं आपको यह अहसास तक नहीं करा पाया कि यह घर आज भी सिर्फ़ और सिर्फ आपका है।”
अभी रसोई के दरवाजे पर सन्नाटा और पिता-पुत्र के बीच का वह भावुक क्षण चल ही रहा था कि अचानक पीछे से किसी के पाँव की आहट सुनाई दी।
आलोक ने चौंककर पीछे देखा तो वहाँ उसकी पत्नी सुमित्रा और उनका इकलौता बेटा आरव खड़े थे। आरव की नींद अभी-अभी खुली थी, वह आँखें मलता हुआ अपनी माँ के साथ खड़ा था। उसके मन में भी वही खौफ था, जो अक्सर आधुनिक घरों की नई पीढ़ी के दिलों में बड़े-बुज़ुर्गों के प्रति बैठ जाता है,एक अनकही सी दूरी, एक असहज़ता।
सुमित्रा की नज़र जब फर्श पर गिरे गुड़ के टुकड़े और सिसकते हुए ससुर और पति पर पड़ी, तो उसके पाँव वहीं ठहर गए। उसके चेहरे के हाव-भाव पलभर में बदल गए। जो सुमित्रा दिनभर काम की थकान और घर की भागदौड़ में कभी-कभार झुंझला जाती थी, या जिसे मास्टर दीवान चंद अपनी किसी फरमाइश से नाराज़ करने से डरते थे, उसका कड़क और व्यस्त मुखौटा एक ही पल में पिघल गया।
आरव ने आगे बढ़कर अपने दादाजी के काँपते हुए हाथ को थामा और थोड़ी रुंधी हुई आवाज़ में बोला, “दादाजी… आपको गुड़ या कुछऔर भी चाहिए था, तो आपने मुझे या पापा को क्यों नहीं जगाया? आप ऐसे छिपकर क्यों ले रहे थे जैसे आपने कोई गुनाह किया हो…”
सुमित्रा की आँखें भी छलक आईं। उसने आगे बढ़कर ससुर के पाँवों को छुआ और भर्राई हुई आवाज़ में बोलीं, “बापूजी, हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमने अपनी दुनिया इतनी समेट ली और ख़ुद को कामों में इतना मशगूल कर लिया कि हमें यह एहसास ही नहीं रहा कि इस घर की असली छाँव तो आप हैं। हमसे डरने की नहीं, हमें डाँटने की हक़दार आपकी यह जगह है।”
मास्टर दीवान चंद ने अपने काँपते हाथों से पोते के सिर पर हाथ फेरा और बहू के कंधे को प्यार से छुआ। उनके दिल का वह आखिरी कोना भी जो बरसों से वीरान और सहमा हुआ था, अब पूरी तरह से भर चुका था।
उस रात उस छोटे से किचन में कोई डर नहीं बचा था,बची थी तो सिर्फ़ टूटी हुई दीवारों के मलबे पर अपनों के प्यार से दोबारा बनी एक नई, गर्मजोशी भरी दुनिया। सुबह हुई तो सूरज की किरणें हमेशा की तरह खिड़की से अंदर आईं, लेकिन उस दिन हवा में वह घुटन और ख़ामोशी नहीं थी, बल्कि एक नया सुकून था।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
