सारी दाल हो गई काली
नहीं दाल में कालासारी दाल हो गई काली। राम दान केसभी लुटेरेपहने पीत चदरियातिलक लगाए रामचन्द्र काबसते औध नगरियाराम पाँव
Read Moreनहीं दाल में कालासारी दाल हो गई काली। राम दान केसभी लुटेरेपहने पीत चदरियातिलक लगाए रामचन्द्र काबसते औध नगरियाराम पाँव
Read Moreरिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥ मन के भीतर टूटते, कितने
Read Moreनाम-पता सब देह के, जग के मात्र निशान।आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥ मोबाइल, घर, गाँव सब, बदलें दिन
Read Moreजंजीरें यदि न कट सकें, बदलो अपनी चाल।लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ बंधन चाहे लाख हों, मत खोना विश्वास।हिम्मत
Read Moreमत करना इंतज़ार तू, कोई आए साथ।खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ पिता, बंधु या संगिनी, दें
Read Moreमौन अधर पर था कभी, नयनों में थी पीर।अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ बंधन जितने बाँधते, उतनी बढ़ती
Read Moreघर-आँगन की छाँव में, पलते प्रेम-विचार।लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥ माटी केवल खेत की, नहीं हृदय का
Read Moreकोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।भीतर-भीतर है छुपी, सबके कोई पीर।। हँसते चेहरों के तले, दर्दों की जागीर।बाहर सावन-सा
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