गीत/नवगीत

नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर

नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर।
केवल औछे लोग ही, दिखलाते हैं जोर।।

धन-दौलत के मद फँसे, भूले सब व्यवहार,
अहंकारों की आग में, जलता उनका द्वार।
सच्चे हीरे मौन हैं, झूठे करते शोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर।।

मीठे वचन गरीब के, लगते हैं अनमोल,
घमंडी की बात में, कहाँ प्रेम के बोल।
मानवता के सामने, फीके चाँदी-तोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर।।

ऊँचे होकर वृक्ष भी, झुके जमीं की ओर,
फल से लदकर डालियाँ, कब दिखलाती जोर।
औछेपन की धूप में, सूखें मन के छोर—
नोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh