विचार-विक्रय, वफ़ादारी-विसर्जन और सत्ता-सुगंध का बंगाली संग्राम
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों किसी विचारधारा का अखाड़ा कम और “राजनीतिक रियलिटी शो” ज्यादा लगने लगी है। फर्क बस इतना है कि यहाँ वोट जनता डालती है, लेकिन “वोटों की हवा” देखकर नेता अपनी विचारधारा बदलते हैं। कल तक जो नेता लाल झंडा उठाकर पूँजीवाद को देश का सबसे बड़ा दुश्मन बताते थे, आज वही भगवा गमछा डालकर “राष्ट्रवाद” का ऑनलाइन कोर्स पढ़ा रहे हैं। और जो कल तक टीएमसी की रैलियों में “दीदी ओ दीदी” के विरोध पर नाराज़ होते थे, आज वही भाजपा कार्यालय के बाहर लाइन लगाकर कह रहे हैं — “हम तो शुरू से ही राष्ट्रवादी थे, बस परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं!”
पश्चिम बंगाल में जैसे ही यह खबर फैली कि भाजपा की स्थिति मजबूत हो रही है और सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं, वैसे ही राजनीतिक मौसम विभाग ने “विचारधारा परिवर्तन” का ऑरेंज अलर्ट जारी कर दिया। नेताओं के घरों में पुराने झंडों की धुलाई शुरू हो गई। कुछ ने तो एहतियातन अपने घरों में हर रंग के झंडे रख लिए — लाल, हरा और भगवा। ताकि सत्ता का रिजल्ट आते ही सिर्फ झंडा बदलना पड़े, दीवारों का पेंट नहीं।
वामपंथी नेताओं की हालत सबसे दिलचस्प है। जिनकी पूरी जिंदगी “संघवाद” और “भगवाकरण” को लोकतंत्र का खतरा बताने में बीती, वे अब भाजपा के मंच से “भारत माता की जय” बोलते हुए इतने भावुक हो जाते हैं कि पुराने साथी टीवी पर देखकर चाय गिरा देते हैं। कल तक जो मार्क्स और लेनिन के उद्धरण सुनाते थे, आज वे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से राष्ट्रवाद पर पीएचडी कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि विचारधारा अब पुस्तकालय की चीज हो गई है और सत्ता ही असली धर्म बन चुकी है।
टीएमसी के कई नेता भी कम अद्भुत नहीं हैं। कल तक वे भाजपा को “बाहरी पार्टी” बताते थे, लेकिन अब वही नेता दिल्ली जाकर भाजपा कार्यालय में ऐसे मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवा रहे हैं जैसे बरसों से खोया परिवार मिल गया हो। एक नेता ने तो इतना भावुक होकर पार्टी बदली कि पुराने भाषण डिलीट करने के लिए पूरी सोशल मीडिया टीम लगानी पड़ी। क्योंकि तीन महीने पहले तक वे जिस पार्टी को लोकतंत्र का खतरा बता रहे थे, आज उसी पार्टी को “राष्ट्र निर्माण की अंतिम आशा” कह रहे हैं।
सबसे मजेदार स्थिति कार्यकर्ताओं की है। बेचारे कार्यकर्ता इतने भ्रमित हैं कि उन्हें अब यह समझ नहीं आता कि गाली किसे दें और जयकारा किसका लगाएँ। मोहल्ले के एक कार्यकर्ता ने तो एहतियातन अपने स्कूटर पर दोनों पार्टियों के स्टिकर लगा रखे हैं। पूछने पर बोला — “भैया, राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता, बस कुर्सी स्थायी होती है।”
राजनीति अब विचारों का संघर्ष नहीं रही, बल्कि “करियर मैनेजमेंट” बन चुकी है। पहले लोग नौकरी बदलते थे, अब विचारधारा बदलते हैं। पहले रिज्यूमे में अनुभव लिखा जाता था, अब “कितनी पार्टियाँ बदलीं” यह राजनीतिक अनुभव माना जाता है। बंगाल के कुछ नेता तो इतने अनुभवी हो चुके हैं कि वे हर विचारधारा में खुद को सहज महसूस करते हैं। सुबह सेक्युलर, दोपहर में समाजवादी, शाम को राष्ट्रवादी और रात को अवसरवादी — सब कुछ एक ही दिन में।
कभी वामपंथी राजनीति त्याग, संघर्ष और सिद्धांतों की बात करती थी। आज वही लोग सत्ता की सीढ़ियाँ देखकर ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे रेलवे स्टेशन पर आखिरी ट्रेन छूट रही हो। जिन नेताओं ने जनता को सालों तक “सांप्रदायिक ताकतों से सावधान” रहने का भाषण दिया, वे अब खुद उन्हीं ताकतों के साथ सेल्फी लेकर लिख रहे हैं — “नई शुरुआत”। जनता भी अब समझदार हो चुकी है। उसे पता है कि यह “हृदय परिवर्तन” कम और “सरकार परिवर्तन” ज्यादा है।
दरअसल राजनीति में विचारधारा अब मोबाइल के डेटा पैक जैसी हो गई है — जब तक फायदा है, तब तक एक्टिव। फायदा खत्म, तो नया पैक रिचार्ज। आजकल नेताओं का नया सिद्धांत है — “जहाँ सत्ता, वहीं सत्य।” यदि कल को राजनीतिक हवा फिर बदल जाए तो यही नेता वापस पुराने झंडे निकालकर कहेंगे — “हमने कभी अपनी मूल विचारधारा नहीं छोड़ी थी, हम तो बस लोकतंत्र बचाने अंदर गए थे।”
बंगाल की राजनीति देखकर लगता है कि भविष्य में राजनीतिक दलों को अपने कार्यालयों में “विचारधारा वार्डरोब” बनवाना पड़ेगा, जहाँ नेता परिस्थिति के हिसाब से कपड़े और विचार दोनों बदल सकें। मीडिया वाले भी बेचारे परेशान हैं। कल तक जिनकी पुरानी क्लिपिंग चलाकर टीआरपी मिलती थी, आज वही क्लिपिंग डिलीट करनी पड़ रही है क्योंकि नेता जी अब नई पार्टी में “सम्मानित राष्ट्रवादी” बन चुके हैं।
जनता भी इस खेल का मजा ले रही है। उसे अब भाषणों से ज्यादा नेताओं की “यू-टर्न स्पीड” में रुचि है। बंगाल में आजकल सबसे तेज़ चीज़ इंटरनेट नहीं, बल्कि नेताओं की बदलती निष्ठा है। राजनीति का नया गणित साफ है — “न सिद्धांत चाहिए, न संघर्ष चाहिए, बस टिकट, सुरक्षा और सत्ता चाहिए।”
और शायद यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा व्यंग्य है — जो नेता कल तक विचारधारा पर जान देने की बातें करते थे, आज वही विचारधारा को प्रेस कॉन्फ्रेंस में छोड़कर नई पार्टी में शामिल हो रहे हैं। अब राजनीति में त्याग नहीं, “टाइमिंग” महत्वपूर्ण है। और बंगाल ने यह कला पूरे देश को सिखा दी है कि राजनीति में स्थायी सिर्फ एक चीज है — फायदा!
— डॉ. शैलेश शुक्ला
