ग़ज़ल
कुछ नया देखने इधर आया
पर तमाशा वही नज़र आया
कुछ नहीं है सिवाय वीराना
सोचता हूँ कि मैं किधर आया
भेंट तुमसे कहीं न होनी थी
मैं कहाँ से कहाँ गुज़र आया
चढ़ गया था बुलन्द टंकी पर
लोग अंधे, बधिर, उतर आया
कर रहे थे गुणा-गणित मन में
सामने योग-ऋण सिफ़र आया
फ़िल्म केवल प्रचार करती है
मैं गया और देखकर आया
प्यास पानी तलाश करती है
ताल से गाँव में मगर आया
— केशव शरण
