अधूरे जज्बात
मैं मंदिर गया
मैं मस्जिद गया
मेरी रगों में
मोहब्बत का गीत
फिर भी
ज़रे ज़रे में
बहता गया ।
इश्क विश्क
थोड़ा-थोड़ा
हम भी
किसी न किसी से
करते रहे
इसीलिए गमों का
बोझ उठाए फिरते रहें।
कभी किसी को
समझाया
मान अपना
कभी खुद को
समझाया
हमदर्द
मान अपना
— डॉ. राजीव डोगरा
