गरीब मरीज पूछ रहा है— क्या मेरा जीवन इतना सस्ता है?
स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा अस्पतालों की इमारतों से नहीं, मरीज को समय पर मिलने वाले उपचार से होती है। दुर्भाग्य से, देश की चिकित्सा व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में गिने जाने वाले एम्स भी अब लंबी प्रतीक्षा की समस्या से जूझ रहे हैं। एम्स भोपाल में गैर-इमरजेंसी (रूटीन) केस में कई मरीजों को सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जरूरी जांच के लिए तीन-चार माह इंतजार करना पड़े, तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का संकेत है। बीमारी न प्रशासनिक प्रक्रियाओं का इंतजार करती है, न सरकारी गति का; वह हर दिन गंभीर होती जाती है। ऐसे में 120 दिन बाद जांच की तारीख मिलना एक चिंताजनक प्रश्न खड़ा करता है—इसका बोझ आखिर कौन उठाएगा, मरीज, उसका परिवार या उसका जीवन?
एम्स भोपाल की लंबी वेटिंग लिस्ट अब केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पुरानी चुनौती का प्रतीक बन गई है। कम खर्च में बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के लिए सस्ता इलाज भी तब बेमानी हो जाता है, जब जरूरी जांच ही महीनों बाद उपलब्ध हो। पेट के असहनीय दर्द, कैंसर की आशंका, मस्तिष्क रोग या अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीज यदि केवल व्यवस्थागत कमी के कारण चार माह प्रतीक्षा करने को विवश हों, तो यह स्वास्थ्य सेवा नहीं, संवेदनहीनता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बीमारी किसी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करती; वह लगातार बढ़ती जाती है और कई बार उपचार की संभावनाओं को भी सीमित कर देती है।
विडंबना यह है कि इस व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ उसी वर्ग पर पड़ रहा है, जिसके नाम पर राजनीति सबसे अधिक होती है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति निजी अस्पताल में कुछ घंटों या दिनों में जांच करा लेता है, लेकिन मजदूर, किसान, छोटा व्यापारी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह विकल्प अक्सर पहुंच से बाहर होता है। ऐसे में उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं—कर्ज लेकर निजी जांच कराए या दर्द और आशंका के बीच सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सहे। यह केवल चिकित्सा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का भी दर्पण है। स्वास्थ्य सुविधाएं आय से नहीं, आवश्यकता से तय होनी चाहिए, किंतु मौजूदा व्यवस्था में पैसे वालों को समय मिलता है और अभावग्रस्तों को इंतजार।
लंबी वेटिंग लिस्ट वर्षों से बढ़ती मांग और अपर्याप्त संसाधन विस्तार की कीमत है। मरीजों का बोझ बढ़ता रहा, लेकिन डॉक्टरों, विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों की संख्या लगभग वहीं ठहरी रही। कई सुपर-स्पेशियलिटी विभाग सीमित मानव संसाधनों पर निर्भर हैं, जबकि रेडियो डायग्नोसिस जैसे अहम विभाग पर्याप्त स्टाफ के अभाव में अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे। परिणाम सामने है—संसाधन मौजूद हैं, पर सेवाएं नहीं; मशीनें हैं, पर समय पर जांच नहीं। प्रश्न यह है कि जब बढ़ती जरूरतें वर्षों से दिखाई दे रही थीं, तब उनकी तैयारी क्यों नहीं की गई? आखिर किस स्तर की चूक ने देश के अग्रणी चिकित्सा संस्थानों को भी प्रतीक्षा के संकट में धकेल दिया?
जब राजनीति का केंद्र तात्कालिक लोकप्रियता बन जाए, तब अस्पतालों की जरूरतें अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं। यही कारण है कि मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं पर अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं, लेकिन डॉक्टरों की भर्ती, नई मशीनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए संसाधनों का अभाव बताया जाता है। विडंबना यह है कि वोट के लिए खजाना खुल जाता है, पर जीवन बचाने के लिए बजट सीमित पड़ जाता है। वास्तविक जनकल्याण मुफ्त सुविधाएं बांटने में नहीं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में है जहां किसी मरीज को जांच के लिए महीनों प्रतीक्षा न करनी पड़े। स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर गंभीर निवेश ही देश की तस्वीर बदल सकता है।
अब जरूरत आश्वासनों नहीं, कार्रवाई की है। एम्स भोपाल में अतिरिक्त सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें लगाई जाएं तथा रेडियो डायग्नोसिस विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों, तकनीशियनों और कर्मचारियों की भर्ती हो। उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए 24 घंटे शिफ्ट आधारित संचालन लागू किया जाए। आयुष्मान भारत के दायरे में सभी आवश्यक जांचें लाई जाएं और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से सुविधाओं का विस्तार हो, बिना मरीजों पर अतिरिक्त बोझ डाले। साथ ही, डिजिटल अपॉइंटमेंट प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। एम्स भोपाल की स्थिति को चेतावनी मानते हुए देशभर के सरकारी अस्पतालों में संसाधन और मानवबल बढ़ाना अनिवार्य है, ताकि मरीजों को इलाज मिले, इंतजार नहीं।
स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ केवल एम्स जैसे संस्थानों के भरोसे नहीं उठाया जा सकता। जब जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं होंगी, तो बड़े संस्थानों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए स्वास्थ्य शिक्षा, रोग-निवारण और प्रारंभिक जांच व्यवस्था को मजबूत करना उतना ही जरूरी है, जितना उपचार सुविधाओं का विस्तार। मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने, विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने और ग्रामीण क्षेत्रों तक आधुनिक जांच सुविधाएं पहुंचाने पर भी समान ध्यान देना होगा। आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था केवल भवनों से नहीं, बल्कि सक्षम मानव संसाधन और जवाबदेह प्रशासन से मजबूत बनती है।
स्वास्थ्य कोई दया या उपकार नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। यदि किसी मरीज को अपनी बीमारी की सच्चाई जानने के लिए महीनों प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं, व्यवस्था की नाकामी है। एम्स भोपाल की चार माह लंबी जांच प्रतीक्षा सूची इसी विफलता का प्रतीक है। यह मौन संकट हजारों परिवारों की चिंता बढ़ा रहा है। सरकारों को याद रखना होगा कि अस्पतालों की कतारों में खड़े लोग आंकड़े नहीं, इंसान हैं। यदि स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिली, तो जनकल्याण के दावे अर्थहीन रह जाएंगे। आखिर सवाल यही है— क्या एक गरीब मरीज के लिए महीनों का इंतजार सामान्य हो गया है? क्योंकि जांच में हर देरी कई बार जीवन की संभावनाएं भी कम कर देती है। ऐसी व्यवस्था पर गर्व नहीं किया जा सकता, जहां बीमारी की रफ्तार उपचार से तेज हो।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
