जिंदगी किराए का मकान है
जिंदगी ठहरी,
किराए का घर,
क्षणभर का।
आए अकेले,
जाना भी होगा,
मौन पथिक।
दीवार बोली,
रिश्तों की गूँज,
क्षणिक रही।
सपनों की छत,
धूप-छाँव मिली,
समय हँसा।
मुट्ठी खाली,
सब यहीं रहना,
सत्य अटल।
प्रेम ही धन,
बाकी सब क्षण,
धूल समान।
— डॉ. अशोक
