Author: डॉ. अशोक कुमार शर्मा

हाइकु/सेदोका

जाते ही श्मशान में मिट गई दूरियां

जीवन भर कीमन की कड़वाहटें,साथ चलीं। अहम के पर्वत,ऊँचे थे बहुत,ढह गए सब। रिश्तों के बीचजो दीवारें थीं,राख हुईं। मौन

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हाइकु/सेदोका

रोने पर मरने वाले की बस तलाश में हैं हम

रोया आकाश,भीगी स्मृतियों में,चुप है पथ। सूनी चौखट,कदमों की आहट,ढूँढ़े मन। बुझते दीपक,धुएँ की लकीरों में,चेहरा खोया। टूटी प्रतिध्वनि,वक्त के

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पर्यावरण

शहरी पर्यावरण कवच: वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता

शहरीकरण आधुनिक सभ्यता के विकास की सबसे प्रमुख विशेषता बन चुका है। यह आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विस्तार, रोजगार सृजन और

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हाइकु/सेदोका

हत्या का कलंक न लगे रिश्तों में

रिश्तों की डोरधीरे-धीरे टूटे,शब्दों की मार। मन के आँगनविश्वास के दीपकक्यों बुझ जाते। चेहरे हँसते,भीतर मौन हिंसाघर बना लेती। क्रोध

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