बीता हुआ कल आज़ की स्मृति है
बीते दिन की धूप
मन के आँगन में आज
धीरे उतरती
यादों के धागे
समय से बुनते रहते
जीवन का ताना
कल की परछाई
आज के चेहरे पर
मौन ठहरती
स्मृतियों की गंध
पुरानी राहों से ही
मन को छू जाती
बीता हर क्षण
आज की नींव बनकर
खड़ा दिखाई
खोए हुए पल
कभी-कभी लौट आते
खामोश होकर
सपनों के रंग
बीते कल से ही तो
निखर कर आते
समय की धारा
अतीत को बहाकर
आज में लाए
मन की खिड़की
खुलते ही दिख जाता
बीता संसार
यादों की लौ
अंधेरे में भी देती
जीने का प्रकाश
बीता हुआ कल
आज की स्मृति बनकर
राह दिखाता
हर अनुभव
सीख बनकर ही तो
आगे बढ़ाता
— डॉ. अशोक
