वह मेरी पनाह में सिमट गई
बरसों बीत गए थे, यादों की धूल ने उन रास्तों को धुंधला कर दिया था जिन पर हम कभी साथ चले थे। लेकिन ज़िंदगी के सफ़र में कुछ मोड़ ऐसे होते हैं जहाँ इंसान मुड़कर देखने पर मजबूर हो जाता है। एक रोज़ अचानक फ़ोन की घंटी बजी, और दूसरी तरफ़ से वह आवाज़ आई जिसे ज़माने की गर्द ने कहीं छुपा दिया था।
उसने कहीं से मेरा नंबर ढूँढा था। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लरज़िश (कंपकंपाहट) थी। उसने कहा, मैं तन्हा हूँ। मैने पूछा कौन उसने फ़ौरन नाम बताया में पूछा गया,मुझे सब याद आने लगा,
उसकी बातों से अंदाज़ा हुआ कि वक़्त की बेरहमी ने उसे तोड़ कर रख दिया है। उसने बताया कि कैसे रफ़्ता-रफ़्ता सब उसे छोड़ते गए, कैसे रिश्तों की रौनकें मातम में बदल गईं। उसने कहा कि बरसों से मेरा ख़याल उसके ज़हन के किसी गोशे (कोने) में महफ़ूज़ था। आज जब उसके ज़ब्त की दीवार गिरी, तो उसने मुझे फ़ोन कर लिया।
शुरू में तो कोई रिश्ता साफ़ न था। उसने मुझे ‘भाई’ कहकर पुकारा, शायद उस दर्द को कोई नाम देने की कोशिश की थी जिसे वह अकेले ढो रही थी। फ़ोन पर वह बहुत रोई। उसके आँसुओं में वह तमाम ज़हर बह गया जो बरसों से उसके सीने में जमा था। मेरी हमदर्दी और उसकी तन्हाई ने एक ऐसा पुल बनाया जिस पर हम फ़िर से मिलने लगे।
मुलाक़ातों का सिलसिला बढ़ा, तो परदे हटने लगे। एक दिन उसने अपनी आँखों में सिमटी सारी हक़ीक़त बयान कर दी। उसने कहा,”मैं तुमसे मोहब्बत करने लगी हूँ… या शायद मैं तो स्कूल के ज़माने से ही अपना दिल तुम्हें हार बैठी थी।”
उसने बताया कि उस वक़्त ज़ुबान हरकत न कर सकी, डर और हया ने लफ़्ज़ों को जकड़ लिया था। मैं हैरान था कि इस रिश्ते को क्या नाम दूँ? क्या यह महज़ हमदर्दी थी या बरसों पुरानी दबी हुई चिंगारी?
मगर जब मैंने उसकी आँखों में देखा, तो पाया कि मैं भी उसके लम्स (छूने) की तपिश से पिघलने लगा हूँ। उसकी आँखों के गहरे समंदर में मेरी तमाम दलीलें डूब चुकी थीं। रफ़्ता-रफ़्ता हम दोनों उस अफ़साने का हिस्सा बन गए जिसकी इब्तिदा (शुरुआत) तो बरसों पहले हुई थी, मगर तकमील (पूरा होना) अब मुक़द्दर थी,
शाम की सुर्ख़ लकीरें आसमान पर उभर आई थीं, जैसे किसी ने कोरे काग़ज़ पर मोहब्बत की इबारत लिख दी हो। हम दोनों शहर के उस ख़ामोश गोशे में बैठे थे जहाँ परिंदों की चहचहाहट के अलावा सिर्फ़ धड़कनों का शोर था।उसने अपनी मख़मली निगाहें उठाकर मुझे देखा, उन आँखों में अब आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी चमक थी जिसे मुद्दतों से लफ़्ज़ों की तलाश थी। उसने हौले से मेरा हाथ थाम लिया। उसके लम्स (स्पर्श) की तपिश ने मेरे वजूद में एक सहर (जादू) सा जगा दिया। ऐसा महसूस हुआ जैसे बरसों की प्यासी ज़मीन पर बारिश की पहली बूंद गिरी हो।उसने आहिस्ता से कहा— “अब और इंतज़ार नहीं होता। ये दूरियाँ, ये ख़ामोशियाँ अब मुझे काटने को दौड़ती हैं।”उस पल मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। मैंने महसूस किया कि उसके सीने में धड़कता दिल और मेरी नब्ज़ की रफ़्तार एक ही लय में बह रहे हैं। वक़्त ठहर गया था। न गुज़रे हुए कल का अंदेशा था, न आने वाले कल की फ़िक्र। बस वो थी, मैं था और दरमियान में फ़ैली हुई एक पाक रूहानी क़शिश।
मैंने उसे अपने क़रीब कर लिया। उसकी साँसों की गर्मी जब मेरी गर्दन से टकराई, तो लगा कि दुनिया की तमाम मुसाफ़िरतें (यात्राएं) ख़त्म हो गई हैं। वह मेरी पनाह में इस तरह सिमट गई जैसे कोई क़श्ती तूफ़ान के बाद साहिल से आ लगी हो। उस मक़ाम पर रूहें आपस में इस तरह पैवस्त (जुड़) हुईं कि यह पहचानना मुश्किल हो गया कि कहाँ उसकी हस्ती ख़त्म होती है और कहाँ से मेरा वजूद शुरू होता है।अब हम महज़ दो इंसान नहीं थे, बल्कि एक ऐसी मुकम्मल कहानी थे जिसे मंज़िल मिल चुकी थी। स्कूल के ज़माने का वो अनकहा इज़हार अब एक मुक़द्दस (पवित्र) हक़ीक़त बन चुका था। अंधेरा गहरा रहा था, मगर हमारे भीतर मोहब्बत का वो चिराग़ रौशन हो चुका था जिसे अब वक़्त की कोई भी आँधी बुझा नहीं सकती थी।
हक़ीक़त त और अफ़साने के दरमियां बस एक धड़कन का फ़ासला होता है। जब जज़्बात सादिक़(सच्चे) हों, तो ख़ुदा ख़ुद क़लम बनकर इंसान की अधूरी दास्तान लिख देता है।”
वक़्त की बे-लगाम रफ़्तार के बीच, उस शाम हमने यह जान लिया कि मुहब्बत कभी बूढ़ी नहीं होती। वह तो महज़ एक इंतज़ार है, जो कभी बरसों की ख़ामोशी ओढ़े रहता है, तो कभी महज़ एक आवाज़ पर जी उठता है।
उस रात जब मैं घर लौटा, तो मेरे कन्धों पर बरसों का बोझ नहीं था, बल्कि उसकी महक का एक असासा (पूंजी) था। मैंने आइने में ख़ुद को देखा, तो अपनी आँखों में वही स्कूल के ज़माने वाली चमक पाई,जैसे वक़्त का पहिया पीछे घूम गया हो,आज हम साथ हैं। अब हमारी गुफ़्तगू में शिकायतों का दफ़्तर नहीं खुलता, बल्कि यादों की महफ़िल सजती है। वह अक्सर मुस्कुरा कर कहती है, “अगर उस रोज़ फ़ोन न किया होता, तो क्या हम आज भी एक-दूसरे की तलाश में भटक रहे होते?”मैं बस खामोश रहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि…
”कुछ कहानियां मंज़िल की मोहताज नहीं होतीं, उनका सफ़र ही उनकी सबसे बड़ी जीत होती है।”
हमारी ये दास्तान अब एक ऐसी नज़्म बन चुकी है, जिसे दुनिया शायद कभी न सुन पाए, मगर कायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में इसकी गूँज हमेशा रहेगी। हमने साबित कर दिया कि अगर रूहें साफ़ हों, तो मुक़द्दर को भी घुटने टेकने पड़ते हैं और बिछड़े हुए मुसाफ़िरों को उनके साहिल से मिलाना ही पड़ता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
