राजनीति

कलम की कसक और लोकतंत्र की ललकार : प्रेस स्वतंत्रता पर बढ़ते प्रश्न

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र में प्रेस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का विषय नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की गुणवत्ता, शासन की पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ प्रश्न है। किसी भी लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है क्योंकि उसका दायित्व सत्ता से प्रश्न पूछना, जनता तक सूचनाएँ पहुँचाना और जनमत का निर्माण करना होता है। इसी कारण विश्व स्तर पर विभिन्न संस्थाएँ समय-समय पर देशों में प्रेस की स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन करती हैं। ऐसी ही एक संस्था है “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स”, जिसने वर्ष 2002 से विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी करना प्रारंभ किया। इस सूचकांक में भारत की स्थिति पिछले दो दशकों में लगातार बहस का विषय रही है। यह बहस केवल रैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इस प्रश्न से जुड़ी है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मीडिया कितना स्वतंत्र, सुरक्षित और प्रभावी है।

वर्ष 2002 में जब पहली बार यह सूचकांक जारी हुआ, तब भारत लगभग 80वें स्थान पर था। उस समय केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी, जिसका नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी कर रहे थे। उस दौर में भारतीय मीडिया अपेक्षाकृत अधिक खुला और बहस प्रधान माना जाता था। निजी समाचार चैनलों का विस्तार हो रहा था, प्रिंट मीडिया प्रभावशाली था और राजनीतिक विमर्श में विविधता दिखाई देती थी। हालाँकि उस समय भी मीडिया पर राजनीतिक प्रभाव, कॉरपोरेट दबाव और क्षेत्रीय असुरक्षाओं के प्रश्न मौजूद थे, किंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति आज की तुलना में बेहतर मानी जाती थी।

वर्ष 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में आई और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। इस अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी, सूचना क्रांति का विस्तार हुआ और डिजिटल मीडिया का प्रारंभिक विकास देखने को मिला। लेकिन इसी दौर में प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की स्थिति धीरे-धीरे नीचे जाने लगी। वर्ष 2010 तक भारत लगभग 122वें स्थान तक पहुँच गया। इसके पीछे अनेक कारण बताए गए। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में पत्रकारों पर हमले, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में रिपोर्टिंग से जुड़ी चुनौतियाँ, कश्मीर और पूर्वोत्तर में सुरक्षा परिस्थितियाँ तथा मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण जैसे विषयों का उल्लेख किया गया। इसके अतिरिक्त यह आरोप भी लगते रहे कि राजनीतिक और कॉरपोरेट हितों का प्रभाव मीडिया संस्थानों पर बढ़ रहा है। “पेड न्यूज़” शब्द इसी दौर में व्यापक चर्चा में आया, जिसने मीडिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।

वर्ष 2014 तक आते-आते भारत की रैंकिंग लगभग 140वें स्थान तक पहुँच चुकी थी। अर्थात लगभग 12 वर्षों में भारत लगभग 60 से अधिक स्थान नीचे चला गया। इस अवधि में यह बहस तेज हुई कि क्या आर्थिक विकास और तकनीकी विस्तार के बावजूद भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता कमजोर हो रही है। आलोचकों का तर्क था कि मीडिया संस्थानों पर कॉरपोरेट नियंत्रण बढ़ने से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित हुई है। दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का मानना था कि भारत जैसे विशाल और जटिल लोकतंत्र की तुलना छोटे देशों से करना पूरी तरह उचित नहीं है। फिर भी यह तथ्य स्पष्ट था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रेस स्वतंत्रता के मामले में कमजोर हो रही थी।

वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार सत्ता में आई। इस अवधि में डिजिटल मीडिया, सामाजिक माध्यम और वैकल्पिक पत्रकारिता का विस्फोटक विस्तार हुआ। समाचार उपभोग की प्रकृति बदल गई। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से करोड़ों लोग प्रत्यक्ष रूप से सूचनाओं से जुड़ने लगे। लेकिन इसी दौर में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर नई बहसें भी सामने आईं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और प्रेस स्वतंत्रता संगठनों ने पत्रकारों की सुरक्षा, ऑनलाइन उत्पीड़न, मुकदमों, इंटरनेट प्रतिबंधों और स्व-सेंसरशिप जैसे मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। आलोचकों का आरोप था कि सरकार की आलोचना करने वाले कुछ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थकों का तर्क था कि भारत में मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है और सामाजिक माध्यमों ने पहले से कहीं अधिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है।

वर्ष 2024 में भारत प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 159वें स्थान पर पहुँचा। यह भारत की अब तक की सबसे कमजोर रैंकिंगों में से एक मानी गई। इसके बाद वर्ष 2025 में भारत की स्थिति सुधरकर लगभग 151वें स्थान तक पहुँची, लेकिन वर्ष 2026 में पुनः गिरावट दर्ज हुई और भारत लगभग 157वें स्थान तक पहुँच गया। इन आँकड़ों को लेकर देश में तीखी बहस हुई। विपक्षी दलों और कई पत्रकार संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक चिंता का विषय बताया, जबकि सरकार समर्थकों और कुछ विश्लेषकों ने इस सूचकांक की पद्धति पर प्रश्न उठाए। उनका कहना था कि भारत जैसे बड़े और विविधतापूर्ण लोकतंत्र को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सूचकांक के आधार पर नहीं आँका जा सकता।

यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक केवल पत्रकारिता की गुणवत्ता नहीं मापता, बल्कि कई कारकों को ध्यान में रखता है। इनमें पत्रकारों की सुरक्षा, राजनीतिक दबाव, कानूनी वातावरण, आर्थिक स्वतंत्रता, मीडिया स्वामित्व, सेंसरशिप और सामाजिक परिस्थितियाँ शामिल होती हैं। इसलिए रैंकिंग का गिरना हमेशा केवल किसी एक सरकार की सीधी विफलता नहीं माना जा सकता। भारत जैसे विशाल देश में अनेक क्षेत्रीय, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ भी होती हैं, जो इन सूचकांकों को प्रभावित करती हैं। फिर भी लगातार गिरती रैंकिंग यह संकेत अवश्य देती है कि प्रेस स्वतंत्रता और मीडिया विश्वसनीयता को लेकर गंभीर प्रश्न मौजूद हैं।

भारतीय मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज उसकी विश्वसनीयता की है। एक बड़ा वर्ग मानता है कि मीडिया का एक हिस्सा अत्यधिक राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो चुका है। कुछ चैनलों पर आरोप लगता है कि वे सरकार समर्थक प्रचार अधिक करते हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ मंचों पर अत्यधिक विरोधी रुख अपनाने का आरोप लगाया जाता है। इस स्थिति ने संतुलित और तथ्य आधारित पत्रकारिता को कमजोर किया है। सामाजिक माध्यमों के विस्तार ने सूचना को लोकतांत्रिक तो बनाया, लेकिन साथ ही फर्जी समाचार, दुष्प्रचार और भावनात्मक प्रचार को भी बढ़ावा दिया। अब हर व्यक्ति सूचनाओं का उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि प्रसारक भी बन गया है। इससे पारंपरिक मीडिया की भूमिका और चुनौती दोनों बढ़ गई हैं।

प्रेस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों का भी अधिकार है। यदि मीडिया स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होगा, तो जनता तक सही सूचना नहीं पहुँच पाएगी। लोकतंत्र में सूचनाओं का प्रवाह जितना पारदर्शी होगा, शासन उतना ही जवाबदेह रहेगा। इसलिए किसी भी सरकार के लिए आलोचना को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा मानना आवश्यक है। दूसरी ओर मीडिया की भी जिम्मेदारी है कि वह तथ्य आधारित, संतुलित और जिम्मेदार पत्रकारिता करे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि अपुष्ट सूचनाएँ या भ्रामक सामग्री प्रसारित की जाए।

भारत की प्रेस स्वतंत्रता पर चर्चा करते समय यह भी स्वीकार करना होगा कि भारतीय मीडिया ने अनेक ऐतिहासिक अवसरों पर लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आपातकाल के दौर से लेकर भ्रष्टाचार के अनेक मामलों तक, मीडिया ने सत्ता से कठिन प्रश्न पूछे हैं। आज भी देश में अनेक साहसी पत्रकार जमीनी मुद्दों पर कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि पत्रकारों की सुरक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता को लेकर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

अंततः पिछले दो दशकों का विश्लेषण यह दर्शाता है कि भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग लगातार दबाव में रही है, चाहे केंद्र में किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो। कांग्रेस के शासनकाल में भी भारत की रैंकिंग तेजी से नीचे गई और वर्तमान सरकार के दौरान भी स्थिति में स्थायी सुधार नहीं दिखाई दिया। इसका अर्थ यह है कि समस्या केवल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक और संस्थागत चुनौतियों से जुड़ी हुई है। मीडिया पर राजनीतिक प्रभाव, कॉरपोरेट नियंत्रण, पत्रकारों की सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रियाएँ, डिजिटल दुष्प्रचार और सामाजिक ध्रुवीकरण — ये सभी कारक मिलकर वर्तमान स्थिति को प्रभावित करते हैं।

भारत यदि विश्व के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखना चाहता है, तो उसे प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया की विश्वसनीयता को गंभीरता से लेना होगा। सरकारों को आलोचना से डरने के बजाय उसे लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में स्वीकार करना चाहिए, और मीडिया को भी जिम्मेदार तथा तथ्यपरक पत्रकारिता की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि स्वतंत्र विचार, निर्भीक पत्रकारिता और जागरूक नागरिकता से जीवित रहता है। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति भी अंततः इसी संतुलन पर निर्भर करेगी।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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