ग़ज़ल
जो नापा जा नहीं सकता वो सच्चा प्यार है पत्नी।
सहारे और किनारे के लिए इकरार है पत्नी।
धरा अम्बर को रूशनाए करे परिवार भीतर लौ,
सवेरे की सुर्ख़ लाली तरह दीदार है पत्नी।
यहां विश्वास पूरी कामना होती इरादों में,
किसी मन्दिर की पूजा अर्चना सत्कार है पत्नी।
अनागत और बीते वक्त की करती है अगुवाई,
है देती पीढ़ियों का प्यार सभ्याचार है पत्नी।
इसी ऊपर ही आश्रय का खड़ा अस्तित्व है सारा,
दलेरी की तमन्ना में खड़ी दीवार है पत्नी।
छुपाए ज़िंदगी के राज़ लेकिन मुँह नहीं खोले,
मनोरथ साधना का मेल है दिलदार है पत्नी।
अनगिनत ख़ूबसूरत फूल इस की डाल पर खिलते,
बहारों पतझड़ों के योग का गुलज़ार है पत्नी।
स्वामी की तमन्ना को महक की उत्पति देवे,
विविधरंगों के फूलों का मनोहर हार है पत्नी।
इसे नारीश्वर अर्धांगिनी का रूप कहते हैं,
सब्र संतोष के अलंकार का श्रृंगार है पत्नी।
खिले तो आंगना भीतर मुलायम छांव उतरे है,
सदाचारी सभ्य कोमल अदा कचनार है पत्नी।
एकाधिक दुख तथा सुख को खामोशी में सिमट लेती,
गुणों की खान है करूणा का इक भण्डार है पत्नी।
यथा अम्बर कलेजे साथ रखता चांद और सूरज,
स्वामी की सभी इच्छा की पहरेदार है पत्नी।
कई भगवान कई स्वर्ग इसके सम नहीं होते,
स्वार्थ रहित जीवन में अलौकिक यार है पत्नी।
यही कर्तव्य यही स्वर्ग यही है तीर्थ की यात्रा,
मनोरथ के समर्पित साथ में परिवार है पत्नी।
इसी में दोस्ती शालीनता के फूटते अंकुर,
किसी पौधे से पहले बीज का आधार है पत्नी।
अपूर्ण को करे पूर्ण करे साकारत्मिक चिंतन,
भवन के प्यार भीतर साधना उपकार है पत्नी।
हमेशा सेतु के प्रकार बालम जिंदा रहना है,
मेरे दिल की नदी के आर और फिर पार है पत्नी।
— बलविंदर बालम
