मजदूर चाहता है
दो प्रेम के मीठे से बोल डाल दे थके बदन में जान,
ये मजदूर चाहता है तुमसे बस थोड़ा सा सम्मान ।
परिवार को पालना कर्म कसौटी पर बना लिया धर्म,
पढ़ ना सका कोई मगर श्रमिकों के जीवन का मर्म,
बोझा ढोएं दिन-रात सिर पर रख जिम्मेदारी का भार,
हॅंसकर सहते रहे वो सदा मौसम की आडी़- टेढ़ी मार,
अरे ओ ऊॅंचे महलों वालों ! तुमने नहीं दिया कभी ध्यान ।
कर्म को साक्षी माना भाग्य से नहीं करें वो शिकायत,
तन-मन से है मजबूत मगर तुमने नहीं समझा लायक,
क्यों करते गरीबी का उपहास नसीब में नहीं जो छत,
आज तुम्हारा समय उत्तम कल आयेगा अपना भी वक्त,
अरे ओ मोटे पैसे वालों ! तुम करते रूपयों का अभिमान ।
मजदूरों की आवाज को सुनने वाले नेक बंदे हैं बस चंद,
आगे-पीछे चले जीवन गाड़ी मगर हौसला हमारा बुलंद,
मेहनत ईमान की रूखी-सूखी रोटी में मिलें हैं संतोष,
भरना नहीं हैं हमको बेईमानी से अपना “आनंद” कोष,
अरे ओ झिड़कने वालों ! प्रेम नहीं घटाएगा तुम्हारी शान ।
— मोनिका डागा “आनंद”
