छोटी छोटी नोंक-झोंक
सुबह की चाय में
हल्की सी मुस्कान छिड़ी
बातें फिर भी तीखी
खिड़की के कोने पर
धूप और परछाई की
चुपचाप सी लड़ाई
तुम्हारी मेरी बात
हवा में उड़ते शब्दों की
नन्ही सी खींचातानी
बारिश की बूँदों में
भीगती हुई नाराज़गी
फिर भी अपनापन
रसोई की खुशबू में
छुपी हुई तकरारें भी
मीठी सी लगती हैं
रात के सन्नाटे में
एक अधूरी सी बहस
नींद में खो जाती
कागज़ पर लिखी बात
मिटती फिर उभर आती
यादों की तरह से
दिल की इन गलियों में
छोटी छोटी नोक-झोंक
प्यार बनकर बसती
— डॉ. अशोक
