ग़ज़ल
उसके दर्द में शामिल अब तक कोई नहीं
यही सोच कर बरसों से मैं सोई नहीं
जिन पेड़ों से किसी को कोई लाभ ना हो
ऐसी फ़स्ल अभी तक मैंने बोई नहीं
उससे प्यार था लेकिन अपनी सुध भी थी
उसके इश्क़ में इतना भी मैं खोई नहीं
मुझसे बिछड़ कर और ना वो रंजीदा हो
यही सोच कर सामने उसके रोइ नहीं
अब के बरस जज़्बात की दी उसने सौगात
शाल नहीं दी चूड़ी नहीं दी लोई नहीं
नमिता वह कब दस्तक दे दरवाज़े पर
इसी फिक्र में आज तलक मैं सोई नहीं
— नमिता राकेश
