सामाजिक

श्रम को केवल ‘मजदूरी’ के संकुचित तराजू में न तौलें

मजदूर दिवस केवल एक तिथि विशेष का उत्सव या कैलेंडर का कोई लाल पन्ना मात्र नहीं है, बल्कि यह उस आदिम संघर्ष और आधुनिक संकल्प का पावन संगम है जिसने मानव इतिहास के हर कालखंड में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है। जब हम सभ्यता के विकास क्रम पर दृष्टि डालते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि ऊँची अट्टालिकाओं के कंगूरों से लेकर समुद्र का सीना चीरकर बनाए गए विशाल सेतुओं तक, हर निर्माण की आत्मा में किसी श्रमिक का मौन बलिदान और उसकी मांसपेशियों का खिंचाव समाहित है। एक मजदूर का परिश्रम केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि वह पवित्र यज्ञ है जिसमें वह अपने जीवन की ऊर्जा को झोंककर समाज के लिए सुख-सुविधाओं का सृजन करता है। समाज अक्सर तैयार ढांचे की बाहरी सुंदरता और तकनीकी छलांग पर तो मोहित हो जाता है, लेकिन उस मटमैले चेहरे और धूल से सने व्यक्तित्व को विस्मृत कर देता है जिसने उस ढांचे को खड़ा करने के लिए कड़कती धूप की जलन और शारीरिक कष्टों को अपनी नियति मानकर स्वीकार किया है।

वास्तव में, मजदूर का पसीना वह ‘तरल सोना’ है जिससे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था की चमक बरकरार रहती है, परंतु यह एक कटु विडंबना है कि जिस हाथ ने पूरी दुनिया के लिए महलों की नींव रखी, वह स्वयं अक्सर एक अदद छत और बुनियादी सुविधाओं के लिए ताउम्र संघर्ष करता रह जाता है। श्रम की इस दास्तान में केवल शारीरिक थकान ही नहीं, बल्कि वह अदम्य मानवीय जिजीविषा और मानसिक दृढ़ता भी शामिल है जो घोर अभावों के बीच भी सृजन का साहस बनाए रखती है। मशीनीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में भी मानवीय श्रम का कोई विकल्प नहीं हो सकता, क्योंकि मशीनें कार्य तो कुशलता से कर सकती हैं, लेकिन उनमें वह संवेदना, भावना और समर्पण नहीं हो सकता जो एक श्रमिक अपने काम के हर कतरे में पिरोता है। यह दिवस हमें उस ऐतिहासिक संघर्ष की भी स्मृति दिलाता है जब श्रमिकों ने अपने मानवाधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवाज बुलंद की थी, यह स्थापित करते हुए कि वे कोई निर्जीव पुर्जे नहीं बल्कि समाज की एक जीवंत और गौरवशाली इकाई हैं।

आज का यह विशेष संदर्भ हमें मजबूर करता है कि हम विकास की परिभाषा को केवल जीडीपी के निर्जीव आंकड़ों में न मापें, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर में आए सुधार से आंकें जिसकी मेहनत ने उन आंकड़ों को जन्म दिया है। समाज का यह नैतिक उत्तरदायित्व है कि वह श्रम को केवल ‘मजदूरी’ के संकुचित तराजू में न तौले, बल्कि उसे ‘सम्मान’ के ऊँचे सिंहासन पर बिठाए, क्योंकि जब तक पसीने की बूंदों का मूल्य केवल रुपयों में आंका जाएगा, तब तक सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी ही रहेगी। हमें एक ऐसे संवेदनशील तंत्र और वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ राष्ट्र के इन निर्माताओं को अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और अपने बच्चों के भविष्य के लिए याचना न करनी पड़े, बल्कि सत्ता और समाज स्वयं आगे बढ़कर उनकी उंगलियों के पोरों में दबी हुई सभ्यता की कहानियों को सहेजने का प्रयास करें।

यह संपादकीय उन करोड़ों अज्ञात नायकों को समर्पित है जो इतिहास की किताबों के मुख्य पृष्ठों पर तो दर्ज नहीं होते, लेकिन जिनके बिना इतिहास का एक भी पन्ना लिखा जाना संभव नहीं है। अतः आज का यह दिन केवल औपचारिक अभिवादन या प्रशंसा का नहीं है, बल्कि यह समाज और सत्ता के विवेक को झकझोरने का क्षण है, ताकि हम निर्माण की प्रक्रिया में लगे इन हाथों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके अधिकारों की रक्षा का सामूहिक संकल्प ले सकें। आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि यह चमकती हुई आधुनिक दुनिया किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि एक मजदूर के अडिग परिश्रम, उसके छालों की मूक दास्तान और उसके अमूल्य पसीने की स्याही से लिखी गई एक अमर गाथा है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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