डिफॉल्ट

आदमी का दुःख

नारी की पीड़ा सबको दिखे 

पुरुष की न देखे कोय 

क्या क्या न वो सहता 

रखने को घर की लाज 

न कह सके किसी से वो 

मन की अपनी व्यथा 

भीतर भीतर ही घुटे 

बाहर के बड़े बड़े झंझवात वो झेले ले 

घर के क्लेश न सह पाए 

एक दिन होकर निराश जिंदगी से 

 कर लेता अपने लीला समाप्त 

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020

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