संत गोस्वामी तुलसीदास
राजापुर की धरा से उपजा, एक अनूठा रत्न महान।
तुलसीदास नाम था जिनका, किया रामयश का गुगान ।
बचपन कठिन रहा जीवन का, माता-पिता से हुए अनाथ।
हृदय में बसे राम पुरुषोत्तम , भक्तिभाव से थामा हाथ।
अवधी भाषा को अपनाकर, महाकाव्य रच दिया अनूप।
“रामचरितमानस” कहलाया, गायक पड़े नहीं भवकूप।
संस्कृत संग लोकभाषा को, दिया विश्वभर में सम्मान।
जन-मन में दोहे – चौपाई , रचे – बसे करते कल्याण ।
राम-कथा घर – घर पहुँचायी, खोले सहज मुक्ति के द्वार,
श्रीराम के आदर्शों का, , ‘रामनाम’ बाँटा उपहार।
“विनयपत्रिका” और “कवितावली”, रचनाएँ अनुपम अनमोल।
“हनुमान चालीसा” रचना कर , उर में दिया भक्तिरस घोल ।
काशी की गलियों में विचरे, रामभक्ति का किया प्रचार।
राम-नाम के सुमिरन में ही, पाया पावन जीवन-सार।
निर्बल के बल राम बताया, दीन – दुखी, पतितों के नायक।
दुष्टों के संहार हेतु ही, राम चलाते मारक शायक।
वेद-पुराणों के ज्ञाता थे, तुलसी संस्कृति के पोषक।
रामराज्य का किया निरूपण, सगुण भक्ति के उद्घोषक।
पाठ सिखाया मर्यादा का , राम – चरित्र का किया बखान।
युगों-युगों तक स्मरण रहेगा, तुलसी का चिर मानस गान।
— गौरीशंकर वैश्य विनम्र
