कहानी

कहानी – स्वतंत्रता का पाठ

सन 1930 के दशक की शुरुआत का समय था। चटगांव के आसमान पर अक्सर घने काले बादल छाए रहते थे। यह सिर्फ मौसम का हाल नहीं था, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का भी प्रतीक था। ब्रितानी हुकूमत के अत्याचारों ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी थी। चटगांव की संकरी और कच्ची पक्की गलियों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता था। यह वह सन्नाटा था जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले महसूस किया जाता है। पुलिस और ब्रिटिश सैनिकों की टुकड़ियां अपने भारी जूतों की आवाज के साथ हर चौराहे पर गश्त करती थीं। उन जूतों की थाप सुनकर घरों के दरवाजे अपने आप बंद हो जाते थे। लोग बहुत धीमी आवाज में बात करते थे। खिड़कियां आधी बंद रखी जाती थीं और बच्चों को सख्त हिदायत दी जाती थी कि वे सड़क पर किसी भी अजनबी से बात न करें और न ही किसी सवाल का जवाब दें।

इसी घुटन भरे माहौल में पंद्रह साल का नील अपने माता पिता के साथ एक छोटे से खपरैल वाले घर में रहता था। नील के पिता डाक विभाग में एक साधारण बाबू की नौकरी करते थे और उसकी मां घर की चारदीवारी के भीतर अपने छोटे से संसार को संवारने में लगी रहती थीं। नील एक मेधावी छात्र था और उसकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वह खूब पढ़ लिखकर एक बड़ा और सम्मानित आदमी बने। वह चाहता था कि उसके माता पिता को कभी किसी चीज की कमी न हो। लेकिन, उम्र के उस पड़ाव पर नील के बालमन में कई ऐसे सवाल भी जन्म ले रहे थे जिनका जवाब उसे अपनी स्कूली किताबों में नहीं मिलता था। वह अक्सर सोचता था कि आखिर कुछ लोग अपनी जान हथेली पर रखकर इन ताकतवर अंग्रेजों से क्यों लड़ रहे हैं? उन्हें क्या मिलता है इस तरह दर दर भटकने और अपनी जान गंवाने से?

एक शाम जब बाहर तेज बारिश हो रही थी और लालटेन की पीली रोशनी में पूरा परिवार बैठा था, तब नील के पिता ने बहुत ही धीमी और रहस्यमयी आवाज में कहा कि अगर कभी मास्टर दा का नाम सुनो तो यह समझना कि वह केवल एक हाड़ मांस का आदमी नहीं हैं, बल्कि वह अपने आप में एक धधकता हुआ विचार हैं। नील ने अपनी बड़ी बड़ी आंखों से पिता की ओर देखा और बड़ी मासूमियत से पूछा कि क्या वह सचमुच किसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाते थे? पिता के होठों पर एक गर्व भरी मुस्कान तैर गई। उन्होंने हामी भरते हुए कहा कि हां, वह बच्चों को पढ़ाते थे और वही एक साधारण सा दिखने वाला शिक्षक एक दिन इन ताकतवर अंग्रेजों की रातों की नींद उड़ा देगा, यह बात किसी ने सपने में भी नहीं सोची थी।

पिता की इन बातों ने नील के मन में मास्टर दा के प्रति एक गहरी उत्सुकता जगा दी। वह किसी भी तरह उस व्यक्ति को देखना चाहता था जिसके नाम मात्र से उसके पिता की आंखों में इतनी चमक आ जाती थी। कुछ ही दिनों बाद नील को चटगांव की एक पुरानी और खस्ताहाल पाठशाला में जाने का अवसर मिल गया। वहां का दृश्य बिल्कुल साधारण था। एक दुबला पतला व्यक्ति, जिसने बहुत ही सादे सूती कपड़े पहने हुए थे, बच्चों के बीच बैठा था। वह व्यक्ति बहुत ही शांत और सौम्य लग रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा तेज था। उनकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जो किसी को भी सम्मोहित कर सकती थी। वही थे सूर्य सेन, जिन्हें पूरा चटगांव बहुत ही प्रेम और सम्मान के साथ मास्टर दा कहकर बुलाता था। वह बच्चों को भारत का इतिहास पढ़ा रहे थे, लेकिन उनका इतिहास पढ़ाने का तरीका बिल्कुल अलग था। वह केवल तारीखें और राजाओं के नाम नहीं रटा रहे थे, बल्कि वह उन घटनाओं के पीछे छिपे संघर्ष और बलिदान की कहानी सुना रहे थे।

कक्षा जब समाप्त हुई तो मास्टर दा ने बहुत ही स्नेह से बच्चों की ओर देखा और एक सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि बच्चों बताओ, इस दुनिया में सबसे बड़ी ताकत क्या होती है? कक्षा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। फिर एक बच्चे ने झिझकते हुए कहा कि धन सबसे बड़ी ताकत है। दूसरे ने कहा कि नहीं, हथियार और सेना सबसे बड़ी ताकत होती है। मास्टर दा बच्चों के इन मासूम जवाबों पर बहुत ही मधुरता से मुस्कुराए। फिर उन्होंने अपनी गंभीर और खनकती हुई आवाज में कहा कि नहीं बच्चों, दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है विश्वास। जिस दिन किसी भी गुलाम राष्ट्र को अपने ऊपर, अपनी ताकत के ऊपर विश्वास हो जाता है, उस दिन दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति भी उनके सामने कांपने लगती है। नील उस दिन कक्षा के एक कोने में खड़ा यह सब सुन रहा था। मास्टर दा के वे शब्द उसके दिलोदिमाग पर हमेशा के लिए अंकित हो गए।

जैसे जैसे समय बीतता गया, नील को इस बात का अहसास होने लगा कि वह पाठशाला केवल अक्षरों और अंकों की पढ़ाई की जगह नहीं थी। वह जगह तो भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराने वाले युवाओं की नर्सरी थी। वहां कुछ चुने हुए युवाओं को अत्यंत कठोर अनुशासन, अदम्य साहस और निस्वार्थ देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता था। नील ने देखा कि वे युवा भोर होने से पहले ही जंगलों में दौड़ लगाते थे, ऊंचे और दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ने का अभ्यास करते थे, सरकारी इमारतों के नक्शे बनाते थे और अंधेरे में बिना कोई आवाज किए चलना सीखते थे। यह सब बहुत ही गुप्त तरीके से होता था। किसी भी एक व्यक्ति को पूरी योजना की जानकारी नहीं दी जाती थी। हर व्यक्ति केवल अपना काम जानता था और उसे उसी पर ध्यान केंद्रित करना होता था।

एक बहुत ही सर्द रात में मास्टर दा ने अपने सबसे विश्वस्त और जुझारू साथियों की एक गुप्त बैठक बुलाई। कमरे के बीचों बीच रखी एक पुरानी लकड़ी की टेबल पर चटगांव का एक बड़ा सा नक्शा फैला हुआ था। कमरे में केवल एक मोमबत्ती जल रही थी जिसकी रोशनी में सबके चेहरे बहुत गंभीर लग रहे थे। मास्टर दा ने नक्शे पर एक जगह अपनी उंगली रखते हुए बहुत ही दृढ़ स्वर में कहा कि अगर हमें इन क्रूर अंग्रेजों को सच्ची चुनौती देनी है, तो केवल सड़कों पर नारे लगाने और पर्चे बांटने से काम नहीं चलेगा। हमें उनकी शक्ति की नस पकड़नी होगी और उसे काटना होगा। उनके एक युवा साथी ने बहुत ही उत्सुकता से पूछा कि यह सब कैसे संभव होगा? मास्टर दा ने पूरी योजना का खुलासा करते हुए कहा कि हमें उनके हथियारों पर कब्जा करना होगा, उनके टेलीग्राफ और टेलीफोन के तारों को काटना होगा और रेलवे की पटरियों को उखाड़ कर यातायात ठप करना होगा। जब तक उन तक यह खबर पहुंचेगी, तब तक पूरी दुनिया यह जान जाएगी कि भारतीय लोग गुलाम होकर भी लड़ना और जीतना जानते हैं। कमरे में बैठे हर एक युवा की आंखों में जैसे बिजली सी चमक दौड़ गई। वे सभी अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार थे।

नील की उम्र बहुत कम थी, इसलिए वह उन खतरनाक अभियानों और बैठकों में सीधे तौर पर शामिल नहीं होता था। लेकिन जब भी बैठक होती, वह बाहर गली के नुक्कड़ पर पहरा देने का काम करता था। उसे इस बात का बहुत गर्व था कि वह भी भारत की आजादी के इस महान यज्ञ में अपनी एक छोटी सी आहुति दे रहा है।

और फिर वह रात आ ही गई। आसमान में उस रात भी काले बादल छाए हुए थे और हवा में एक अजीब सी नमी थी। शहर में गुड फ्राइडे का त्योहार होने की वजह से अंग्रेज अधिकारी जश्न में डूबे थे और सड़कों पर अपेक्षाकृत शांति थी। घड़ी की सुइयों ने जैसे ही रात के दस बजाए, मास्टर दा की योजना पर काम शुरू हो गया। अलग अलग युवा दल अपने अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर बहुत ही फुर्ती और खामोशी से बढ़ चले। एक दल ने चटगांव के पुलिस शस्त्रागार की ओर कूच किया। दूसरे दल ने सहायक बल के शस्त्रागार को अपना निशाना बनाया। तीसरे दल ने फुर्ती से टेलीफोन भवन पर कब्जा किया और सारी संचार लाइनें काटनी शुरू कर दीं। चौथे दल ने शहर को जोड़ने वाले रेलवे मार्ग को बाधित करने के लिए पटरियां उखाड़ दीं।

यह सब कुछ इतनी तेज गति और इतने अचूक तरीके से हुआ कि मदहोश अंग्रेज अधिकारियों को संभलने और प्रतिक्रिया देने का कोई अवसर ही नहीं मिला। कई स्थानों पर भारतीय युवाओं ने बिना किसी भय के और बिना किसी शोर शराबे के अंग्रेज पहरेदारों को निष्क्रिय कर दिया। थोड़ी ही देर में चटगांव के मुख्य शस्त्रागार पर भारतीय क्रांतिकारियों का पूरी तरह से कब्जा हो चुका था। यह एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक जीत थी।

लेकिन, यह खुशी बहुत ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी। युवाओं को वहां से हथियार तो बहुत सारे मिल गए, लेकिन दुर्भाग्य से गोलियां और बारूद वहां मौजूद नहीं था। बिना गोलियों के वे हथियार केवल लोहे के टुकड़े थे। एक युवा क्रांतिकारी यह देखकर बहुत घबरा गया और उसने निराश होकर पूछा कि अब हमारा क्या होगा, बिना गोलियों के हम कैसे लड़ेंगे? ऐसे तनावपूर्ण क्षण में भी मास्टर दा बिल्कुल शांत और विचलित रहे। उन्होंने अपने साथियों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य केवल इन हथियारों को लूटना नहीं था। हमारा असली उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को यह बताना था कि भारत का युवा अब उनसे डरता नहीं है और वह उन पर पलटवार कर सकता है। उसी रात उन्होंने वहां गर्व से भारतीय तिरंगा झंडा फहराया। सभी क्रांतिकारियों ने कतार में खड़े होकर अपने झंडे को सलामी दी। वहीं पर मास्टर दा ने एक अस्थायी स्वतंत्र क्रांतिकारी सरकार के गठन की घोषणा भी कर दी। उस जादुई क्षण में वहां मौजूद हर एक युवक को ऐसा लगा जैसे स्वतंत्र भारत का सपना बस उनके सामने ही साकार होकर खड़ा है। इस घटना ने पूरे ब्रिटिश शासन की जड़ों को हिला कर रख दिया।

नील, जो यह सब छिपकर देख रहा था, उसकी आंखों में खुशी और गर्व के आंसू छलक आए। उसने अपने जीवन में पहली बार यह गहराई से महसूस किया कि देश का झंडा केवल कपड़े का एक रंगीन टुकड़ा नहीं होता। उस झंडे के धागों में करोड़ों लोगों के अनगिनत सपने, उम्मीदें और उनका स्वाभिमान बसा होता है।

लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य बहुत विशाल और क्रूर था। वह इतनी आसानी से अपनी हार मानने वाला नहीं था। उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कुछ ही दिनों के भीतर कलकत्ता और अन्य स्थानों से भारी सैनिक बल आधुनिक हथियारों के साथ चटगांव पहुंच गया। मास्टर दा और उनके क्रांतिकारी साथियों को शहर छोड़कर जलालाबाद की घनी पहाड़ियों की ओर जाना पड़ा। वहां अंग्रेजों और क्रांतिकारियों के बीच एक बहुत ही भीषण और ऐतिहासिक लड़ाई हुई। अंग्रेजों के पास मशीनगनें थीं और क्रांतिकारियों के पास केवल पुरानी बंदूकें और सीमित गोलियां। फिर भी वे भूखे प्यासे युवा शेरों की तरह लड़े। गोलियों की डरावनी आवाजें दूर दूर तक गूंजती रहीं। उस लड़ाई में कई युवा साथी भारत माता की जय बोलते हुए शहीद हो गए। जो बचे, वे मास्टर दा के निर्देश पर छोटे छोटे समूहों में बंट गए और आस पास के अनजान गांवों में छिपकर अपना संघर्ष जारी रखा।

नील भी अब बड़ा हो रहा था और वह भी लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा। वह कभी एक साधारण किसान का रूप धारण कर लेता, कभी मजदूरी करने लगता, तो कभी भेड़ों को चराने वाले चरवाहे के वेश में एक गांव से दूसरे गांव तक गुप्त संदेश पहुंचाता। एक बहुत ही अंधेरी और डरावनी रात में जब वह मास्टर दा से मिला, तो उसने अपने मन का डर सामने रखते हुए पूछा कि अगर हम यह लड़ाई हार गए तो क्या होगा? सूर्य सेन ने उसकी पीठ थपथपाई और बहुत ही प्यार से मुस्कुराकर कहा कि मेरे बच्चे, किसी भी महान क्रांति में हार और जीत का अंतिम फैसला केवल एक लड़ाई के परिणाम से नहीं होता। जो लोग अपने प्राण देकर आने वाली पीढ़ियों के दिलों में साहस का बीज बो जाते हैं, वे लोग असल में कभी हारते नहीं हैं, वे अमर हो जाते हैं। उनकी आवाज में इतना गहरा विश्वास और इतनी सच्चाई थी कि नील के मन में बैठा सारा भय उसी क्षण हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

समय बीतता गया। एक के बाद एक साल गुजरते गए। ब्रिटिश पुलिस और उनकी खुफिया एजेंसियां लगातार मास्टर दा की तलाश में दिन रात एक करती रहीं। उन पर बहुत बड़ा नकद इनाम भी घोषित कर दिया गया। इस दौरान कई क्रांतिकारी पकड़े गए। कई लोगों को काला पानी और अन्य जेलों में भेज दिया गया। लेकिन मास्टर दा अपनी सूझबूझ और भेष बदलने की कला से बार बार पुलिस की पकड़ से बच निकलते थे।

फिर एक दिन वह हुआ जिसका डर था। एक बहुत ही करीबी व्यक्ति ने रुपयों के लालच में आकर पुलिस से विश्वासघात किया। उस मुखबिर ने पुलिस को मास्टर दा के गुप्त ठिकाने की सटीक जानकारी दे दी। रात के घने अंधेरे में पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी ने उस घर को चारों ओर से घेर लिया। मास्टर दा ने खतरे का आभास होते ही अपना हथियार उठा लिया था, लेकिन जब उन्होंने देखा कि गोलीबारी में उनके निर्दोष साथियों की जान जा सकती है, तो उन्होंने अपने साथियों को बचाने के लिए खुद ही अपना संघर्ष रोक दिया। भारी पुलिस बल ने उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया।

नील उस रात कुछ दूरी पर खड़ा अपनी आंखों के सामने यह सब दर्दनाक दृश्य देखता रहा। उसकी मुट्ठियां गुस्से से भींची हुई थीं, उसका खून खौल रहा था, पर वह बिल्कुल निहत्था और अकेला था, इसलिए वह कुछ भी नहीं कर सका। जेल के भीतर मास्टर दा पर ऐसे अमानवीय अत्याचार किए गए जिन्हें सुनकर ही किसी की भी रूह कांप जाए। अंग्रेज अधिकारी हर कीमत पर यह चाहते थे कि वह टूट जाएं और अपने बाकी बचे साथियों के गुप्त नाम और पते बता दें। उनके नाखून खींचे गए, उनकी हड्डियां तोड़ी गईं, लेकिन उस महान तपस्वी ने उफ तक नहीं की। उन्होंने अपने होंठों को ऐसे सी लिया था जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। एक क्रूर अंग्रेज अधिकारी ने झुंझलाकर उनसे पूछा कि क्या तुम्हें मौत से डर नहीं लगता? खून से लथपथ होने के बावजूद मास्टर दा ने बहुत ही शांत और स्थिर स्वर में उत्तर दिया कि डर उन्हें लगता है जो दूसरों पर अन्याय करते हैं, मैं तो अपनी मां की आजादी के लिए लड़ रहा हूं। उनकी मुस्कान उस असहनीय दर्द में भी बिल्कुल वैसी ही थी जैसी पाठशाला में छोटे बच्चों को इतिहास पढ़ाते समय हुआ करती थी।

जेल के बाहर चारों ओर भारी सुरक्षा बल तैनात था। किसी भी आम नागरिक को उस रास्ते पर जाने की अनुमति नहीं थी। जेल के अंदर फांसी का फंदा तैयार किया जा रहा था। नील रात भर से जेल के पास एक पेड़ के पीछे छिपा खड़ा था। वह अपने महान गुरु की बस एक आखिरी झलक पाना चाहता था। कहा जाता है कि फांसी के तख्ते की ओर कदम बढ़ाते हुए भी मास्टर दा के मन में कोई पछतावा या दुख नहीं था। उनके मन में केवल एक ही सपना जीवित था, एक पूर्ण स्वतंत्र और अखंड भारत का सपना। उसी पवित्र सपने को अपनी आंखों में बसाए उन्होंने हंसते हुए वंदे मातरम का नारा लगाया और अपने प्राण भारत माता के चरणों में न्योछावर कर दिए। उनकी इस महान शहादत ने पूरे बंगाल और देश भर के असंख्य युवाओं के भीतर एक ऐसी आग जला दी जिसने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में आगे आने की एक असीम प्रेरणा दी।

आजादी के कई सालों बाद, नील अब एक वृद्ध और अनुभवी शिक्षक बन चुका था। उसने अपने जीवन का उद्देश्य भी शिक्षा को ही बना लिया था। उसके विद्यालय की मुख्य दीवार पर मास्टर दा सूर्य सेन का एक बहुत ही सुंदर चित्र लगा हुआ था। हर वर्ष जब अठारह अप्रैल का दिन आता, तो वह अपनी कक्षा के सभी बच्चों को इकट्ठा करता और उन्हें वही पुरानी कहानी पूरे उत्साह के साथ सुनाता। वह अपने छात्रों से कहता कि मैंने अपने जीवन में एक ऐसे महान शिक्षक को देखा था जिसने कभी भी अपने विद्यार्थियों के मन में किसी के प्रति नफरत नहीं सिखाई। उस शिक्षक ने केवल और केवल साहस और प्रेम का पाठ पढ़ाया। उसने अपने जीवन से यह साबित किया कि शिक्षा का सबसे बड़ा और पवित्र उद्देश्य इंसान को किसी भी तरह के अन्याय और अत्याचार के सामने मजबूती से खड़ा होना सिखाना है।

तभी विद्यालय की छुट्टी की घंटी जोर से बज उठी। सारे बच्चे खुशी से शोर मचाते हुए अपनी अपनी कक्षाओं से बाहर की ओर दौड़ पड़े। नील धीरे से अपनी कुर्सी से उठा और उसने दीवार पर टंगे उस चित्र की ओर बहुत ही श्रद्धा से देखा। उसे उस पल ऐसा लगा जैसे मास्टर दा आज भी उसी शांत और चिर परिचित मुस्कान के साथ उससे कह रहे हों कि क्रांति केवल बंदूकों और गोलियों से नहीं आती, बल्कि वह एक शुद्ध विचार से जन्म लेती है और पीढ़ियों तक जीवित रहती है। खिड़की से छनकर आती हुई सूरज की सुनहरी धूप सीधे उस चित्र पर पड़ रही थी। उस दृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि इतिहास का वह महान और अमर शिक्षक आज भी इस नई पीढ़ी को वही अपना पहला और सबसे महत्वपूर्ण पाठ पढ़ा रहा है, खुद पर विश्वास का पाठ, विपरीत परिस्थितियों में साहस का पाठ और अपनी प्यारी मातृभूमि के प्रति अटूट और निस्वार्थ समर्पण का पाठ।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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