गीत/नवगीत

।।विश्व पर्यावरण दिवस ।।

चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं
एक हाथ निःस्वार्थ दोस्ती का बढ़ाएं
बनावटी पन सब दूर हो जाएगा
जीवन का मर्म समझ में आएगा ।

ध्यान देकर उसकी व्यथा को सुनिए
तदनुसार आप अपने सपने बुनिए
ऐसा न हो शांति कहीं सुदूर छूट जाए
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

सादगी में है जीवन का परम सत्य
जहां प्रेम है वहीं है अपनत्व
कुछ और अधिक पाने की लालसा
बहुधा हमसे करवाती है कुकृत्य ।

अपनी सुविधाओं की ख्वाहिश में
दिनों-दिन बढ़ती फरमाइश में
पर्यावरण को न अधिक हानि पहुंचाएं
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

काट रहे हम अंधाधुंध जंगल
खुद कर रहे हम स्वयं का अमंगल
पर्यावरण को कर रहे प्रदूषित
वातावरण में भर रहे कोलाहल ।

पशु-पक्षियों की घट रही प्रजातियां
कर रही खड़ी नित नयी परेशानियां
पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता जाए
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

नदी, नाले, सागर, ताल, तलैया
प्रदूषण से करें सब दैया रे दैया
जहरीली गैसों से सब हवा संक्रमित
फिर कैसे होंगे भला प्राण प्रफुल्लित।

अपने पैरों ख़ुद हम मारे कुल्हाड़ी
वाह री वाह बुद्धि की बलिहारी
काश ऐसी प्रवृति से बाज आएं
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

दिनों-दिन बढ़ता प्लास्टिक का प्रयोग
फैलाता जीवन में रोग ही रोग
कचरे का पहाड़ जो इकट्ठा कर रहे
स्वयं की हैं गलतियां, न कोई संयोग।

जलवायु परिवर्तन का फर्क दिख रहा
गर्मी का प्रकोप दिनों दिन बढ़ रहा
मौसम का मिजाज समझ न आए
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

बहुत दिनों तक यह नही चलने वाला
खुशियों को ग्रहण है लगने वाला
अनियोजित विकास का है यह फल
क्या सचमुच सुनहरा है अपना कल ?

बीच-बीच में प्रकृति ले रही बदला
पर्यावरण पर मंडराता भीषण खतरा
हमको -आपको बार-बार चेताए
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।
चलो प्रकृति से नजदीकियां बढ़ाएं।।

— नवल अग्रवाल

पलावा, मुम्बई
०५ जून २०२६

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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