तथ्य, दुष्प्रचार और भारतीय राजनीति का बदलता हुआ स्वरूप
भारत में सोशल मीडिया का स्वरूप अब महज एक दूसरे से जुड़ने या तस्वीरें साझा करने के मंच तक सीमित नहीं रह गया है। यह आज राजनीतिक विमर्श, जनमत निर्माण और बड़े जन आंदोलनों का सबसे सशक्त और परिवर्तनकारी माध्यम बन चुका है। कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरह से पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि डिजिटल दुनिया किस प्रकार सड़क की राजनीति को गहराई से आकार दे रही है। इस आंदोलन ने यह पूरी तरह साबित कर दिया है कि युवाओं का असंतोष जब सोशल मीडिया के एल्गोरिदम और नेटवर्क के माध्यम से संगठित होता है, तो वह व्यवस्था के सर्वोच्च स्तर तक अपनी गूंज पहुंचा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में समर्थकों और विरोधियों के बीच जो तीखी बयानबाजी हुई, उसने आधुनिक लोकतंत्र में सूचना, तथ्य और दुष्प्रचार के बीच की लगातार धुंधली होती रेखा को भी पूरी तरह उजागर कर दिया है।
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय एक बहुत ही दिलचस्प और विचारणीय विषय है। इसकी शुरुआत एक व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में हुई थी, जिसका प्रारंभिक उद्देश्य संभवतः व्यवस्था की खामियों पर हल्का कटाक्ष करना था। लेकिन देखते ही देखते यह लाखों युवाओं की मुखर आवाज बन गया। इस अप्रत्याशित सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण वह गहरी और संरचनात्मक निराशा थी जो आज के युवाओं में परीक्षा पत्र लीक होने, भर्ती प्रक्रियाओं में होने वाली घोर अनियमितताओं और लगातार बढ़ती बेरोजगारी को लेकर व्याप्त है। जब भारत के महत्वकांक्षी युवाओं को पारंपरिक राजनीतिक ढांचे में अपने जीवन से जुड़े ज्वलंत सवालों के जवाब नहीं मिले, तो उन्होंने डिजिटल मंचों को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। इस आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल सुधार और रोजगार के समान अवसरों की मांग को इतनी मजबूती से उठाया कि सरकार को भी बचाव की मुद्रा में आना पड़ा। दिल्ली सहित कई अन्य बड़े शहरों में हुए विशाल प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह केवल एक आभासी या डिजिटल आक्रोश नहीं था, बल्कि जमीन पर उबल रहा एक वास्तविक और तीव्र गुस्सा था, जिसने अंततः शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक की मांग को मुख्य राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया।
जैसे जैसे आंदोलन ने गति पकड़ी और इसका प्रभाव बढ़ने लगा, वैसे वैसे इसके विरोध में भी एक समानांतर और अत्यंत आक्रामक डिजिटल अभियान शुरू हो गया। सोशल मीडिया की यही मूल प्रकृति है कि यहां हर राजनीतिक क्रिया की एक त्वरित और अक्सर बहुत उग्र प्रतिक्रिया होती है। अनेक वायरल पोस्टों के माध्यम से आंदोलन के संस्थापकों और प्रमुख चेहरों पर अत्यंत गंभीर और संगीन आरोप लगाए जाने लगे। यह दावा बड़े पैमाने पर किया गया कि इस आंदोलन का वास्तविक संचालन विदेशों से हो रहा है और इसके पीछे भारत विरोधी विदेशी शक्तियों का हाथ है। कुछ भ्रामक दावों में तो यहां तक कहा गया कि इनके डिजिटल समर्थकों और फॉलोअर्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा पड़ोसी देशों से संचालित हो रहा है। लेकिन किसी भी परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी आरोप को तब तक सत्य नहीं माना जा सकता जब तक कि उसके समर्थन में ठोस, निष्पक्ष और स्वतंत्र प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न हों। प्रमुख और विश्वसनीय समाचार संस्थानों ने भी इन आंकड़ों की कोई पुष्टि नहीं की। ऐसे में, बिना किसी विश्वसनीय साक्ष्य के इन गम्भीर दावों को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेना केवल राजनीतिक दुष्प्रचार को बढ़ावा देना है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी और शायद सबसे खतरनाक चुनौती यह है कि यहां किसी भी सत्यापित सत्य से अधिक भड़काने वाली भावनाएं तेजी से फैलती हैं। यदि कोई सूचना या दावा राष्ट्रवाद, धर्म, राष्ट्रीय सुरक्षा या किसी ऐतिहासिक अन्याय जैसे संवेदनशील विषयों से जुड़ा हो, तो उसके वायरल होने की गति कई गुना बढ़ जाती है। राजनीतिक दल, उनके सूचना तंत्र और विभिन्न हितधारक संगठन आम जनमानस के इस मनोविज्ञान को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यही कारण है कि आज डिजिटल प्रचार और सूचनाओं का हेरफेर राजनीतिक रणनीति का एक अत्यंत अभिन्न अंग बन गया है। इस पूरी प्रक्रिया में अक्सर अपुष्ट और भ्रामक जानकारी इतने बड़े पैमाने पर और इतनी चतुराई से फैलाई जाती है कि एक आम नागरिक के लिए यह तय करना लगभग असंभव हो जाता है कि क्या सच है और क्या पूर्ण रूप से झूठ। भावनाओं के इस तेज ज्वार में तथ्य कहीं बहुत पीछे छूट जाते हैं, और हमारा समाज एक ऐसे अंधे ध्रुवीकरण की ओर बढ़ जाता है जहां शांत और तार्किक बहस के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
इस पूरे राष्ट्रीय विवाद के दौरान सरकार और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों की भूमिका भी गहन जांच और चर्चा का विषय बनी रही। जब हजारों युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे तो उन पर नजर रखने के लिए सरकार द्वारा ड्रोन, सीसीटीवी कैमरे और अन्य अत्याधुनिक आधुनिक निगरानी प्रणालियों का व्यापक स्तर पर उपयोग किया गया। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह अफवाह भी बहुत तेजी से फैली कि प्रत्येक प्रदर्शनकारी की पहचान उनके आधार कार्ड, फिंगरप्रिंट और चेहरे की पहचान करने वाली तकनीकों के माध्यम से तुरंत की जा रही है। यद्यपि इन डराने वाली बातों की कोई स्वतंत्र मीडिया पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इसने राज्य द्वारा डिजिटल निगरानी के लगातार बढ़ते दायरे पर एक नई और गंभीर कानूनी बहस छेड़ दी। यह सच है कि आधुनिक समय में राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तकनीक का उपयोग आवश्यक है, लेकिन इसका उपयोग नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकारों को दबाने या उनकी निजता के हनन के लिए कतई नहीं किया जाना चाहिए।
इस पूरे राजनीतिक विवाद का एक अत्यंत निराशाजनक पहलू सार्वजनिक संवाद और राजनीतिक भाषा के लगातार गिरते स्तर से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया पर विरोधियों के खिलाफ जिस प्रकार की जहरीली भाषा का प्रयोग किया गया, वह किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए बहुत ही चिंताजनक है। वैचारिक विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए अत्यंत अपमानजनक शब्दों का लगातार इस्तेमाल और यहां तक कि उन्हें हिंसक तरीके से सबक सिखाने की खुली धमकियां आम हो गईं। लोकतंत्र में वैचारिक असहमति का होना न केवल स्वाभाविक है बल्कि व्यवस्था को जीवंत बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक भी है। लेकिन जब यह असहमति व्यक्तिगत शत्रुता में बदल जाए और खुलेआम हिंसा का आह्वान होने लगे, तो यह हमारे महान लोकतांत्रिक मूल्यों का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन माना जाता है। भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन इस अधिकार के साथ यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है कि हम कानून व्यवस्था का सम्मान करें।
डिजिटल आवरण वाले इन आंदोलनों को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठना बिल्कुल लाजिमी है कि क्या ये ऑनलाइन उभार भविष्य में किसी ठोस और स्थायी राजनीतिक विकल्प का रूप ले सकते हैं। दुनिया भर का ऐतिहासिक अनुभव हमें यह बताता है कि सोशल मीडिया के माध्यम से अचानक भीड़ जुटाना या किसी एक मुद्दे को वैश्विक स्तर पर चर्चित कर देना एक बात है, लेकिन उस क्षणिक उबाल को एक स्थायी राजनीतिक शक्ति में बदलना बिल्कुल अलग और कठिन बात है। एक सफल राजनीतिक दल या बड़े आंदोलन के लिए एक बहुत ही स्पष्ट विचारधारा, जमीन से गहराई तक जुड़ा हुआ मजबूत संगठन, पारदर्शी वित्तीय संरचना और अत्यंत दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता होती है। केवल कुछ वायरल वीडियो, व्यंग्यात्मक पोस्ट या लाखों सोशल मीडिया फॉलोअर्स के दम पर किसी भी देश की व्यवस्था में स्थायी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। इन डिजिटल आंदोलनों को यथार्थ के धरातल पर उतरना ही होगा।
अंततः, इस पूरे बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सबसे बड़ी और निर्णायक भूमिका युवाओं, आम नागरिकों और मुख्यधारा की मीडिया की ही रहने वाली है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी युवाओं की है, और यदि उनके रोजगार, निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जुड़े बुनियादी सवालों को नीतिगत स्तर पर हल नहीं किया गया, तो ऐसे आंदोलन भविष्य में भी नए रूपों में जन्म लेते रहेंगे। दूसरी ओर, युवाओं और सभी नागरिकों को भी यह बहुत अच्छी तरह समझना होगा कि वे डिजिटल दुनिया के हर चमकते दावे पर आंख मूंदकर विश्वास न करें। तथ्य जांच करना, सूचना के मूल स्रोत को ध्यान से परखना और भ्रामक संदेशों को आगे साझा करने से बचना आज के समय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण नागरिक कर्तव्य है। आधुनिक लोकतंत्र की वास्तविक सफलता अब केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि हम सार्वजनिक विमर्श को कितनी जिम्मेदारी, तथ्यपरकता और परिपक्वता के साथ आगे बढ़ाते हैं।
— महेन्द्र तिवारी
