ग़ज़ल
जाहिर एक कहानी है,
इक राजा, इक रानी है।
मद्धम, मद्धम बारिश में,
मन का मौसम धानी है।
पीछे से मत वार करो,
चोंट जिगर पे खानी है।
सुर्ख़, दहकती आंखों में,
शायद जलता पानी है।
मतलब दौलत से ही बस,
बाकी सब बेमानी है।
यूं हैं लापरवाह बहुत,
सबकी पर निगरानी है।
छोटी – छोटी ग़ज़लों में,
जय तेरी मनमानी है।
— जयकृष्ण चांडक ‘जय’
