मुक्तक/दोहा

समसामयिक दोहे

रूप चाँदनी भा रही, रही आज मन मोह।
अंतर्मन में नेह है,हर पल है आरोह।।

सन्नाटा छाया हुआ,चुप है हर आवाज़।
सुर भी सब मायूस हैं,खामोशी में साज़।।

हर दिल को तो भा रही,तेरी मृदु मुस्कान ।
हर दिल में रहती सदा,इसकी पावन आन।।

आँसू लगते नेक हैं,जब हो मन में प्यार।
रिश्तों की संजीवनी,अपनेपन का सार।।

भटक न जाना बंधुवर,प्रभु दिखलाते राह।
रखो सत्य उर में सदा,निकलेगी तब वाह।।

अंधकार को मारकर,धारण कर उजियार।
तभी बनेगी ज़िन्दगी,फूलों का संसार।।

प्रभु को मानो हर समय,तभी बनेगी बात।
बन जाएगी ज़िंदगी,सुख की तो बारात।।

कभी न करना लोभ तुम,कभी न करना पाप।
वरना है यह ज़िन्दगी,केवल तो अभिशाप।।

— प्रोफेसर शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com

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