हालात मंजिल बदल देती है
राहें थीं सीधी
अचानक मुड़ गईं
पवन के संग
धूप के साये
चलते रहे कदम
दिशा बदली
सूखी सी मिट्टी
अंकुर फिर भी फूटे
आशा जगी
बादल घिर आए
नदी ने रुख मोड़ा
सागर बदला
थकान के बीच
मन ने राह चुनी
नई मंजिल
खामोश रातें
सपनों से कहतीं
चलते रहो
टूटे किनारे
लहरों ने सिखाया
बदलाव ही सत्य
— डॉ. अशोक
