राजनीति

संसद में महिला आरक्षण: संवैधानिक जरूरत या राजनीतिक रणनीति?

संसद में महिला आरक्षण का प्रश्न भारतीय लोकतंत्र के विकास और उसकी समावेशी प्रकृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता के बाद से ही यह अपेक्षा की जाती रही है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में समाज के सभी वर्गों को समान और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व मिले, किंतु वास्तविकता यह है कि महिलाओं की भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही। इसी पृष्ठभूमि में 2023 में पारित 106वां संविधान संशोधन अधिनियम, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है, एक ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया। इस अधिनियम के तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का एक तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उनके अनुपात में उप-आरक्षण भी शामिल है। यह व्यवस्था भारतीय संविधान में नए अनुच्छेद 330A, 332A और 334A जोड़कर की गई है, जो न केवल आरक्षण के दायरे को परिभाषित करते हैं बल्कि उसकी अवधि और क्रियान्वयन की प्रक्रिया को भी निर्धारित करते हैं।

हालांकि इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विशेषता यह है कि इसके क्रियान्वयन को अगली जनगणना और उसके बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया गया है। इस प्रावधान ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है कि क्या महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना वास्तव में संवैधानिक आवश्यकता है या यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि इसमें संवैधानिक व्याख्या, राजनीतिक हित और प्रशासनिक व्यवहार्यता तीनों ही तत्व शामिल हैं।

संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो संसद को महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार अनुच्छेद 15(3) के तहत प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के पुनर्वितरण के लिए अनुच्छेद 82 और 170 में परिसीमन की व्यवस्था की गई है, जो जनगणना के आधार पर होती है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम में जोड़ा गया अनुच्छेद 334A यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का रोटेशन प्रत्येक परिसीमन के बाद किया जाएगा। यह व्यवस्था पहली दृष्टि में तार्किक प्रतीत होती है, क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि आरक्षण का लाभ विभिन्न क्षेत्रों तक समान रूप से पहुंचे और किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रह जाए।

फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से परिसीमन से जोड़ना आवश्यक था। यदि हम स्थानीय निकायों के स्तर पर लागू 73वें और 74वें संविधान संशोधनों को देखें, तो वहां महिलाओं के लिए आरक्षण को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया था, भले ही परिसीमन की प्रक्रिया बाद में हुई हो। इससे यह संकेत मिलता है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन एक अनिवार्य शर्त नहीं है, बल्कि इसे प्रशासनिक सुविधा के लिए जोड़ा गया है। इसके अलावा, 1996 से 2010 के बीच कई बार प्रस्तुत महिला आरक्षण विधेयकों में इस प्रकार की कोई शर्त नहीं थी, जो यह दर्शाता है कि यह प्रावधान बाद में एक विशेष राजनीतिक संदर्भ में जोड़ा गया।

राजनीतिक दृष्टिकोण से इस प्रावधान का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि परिसीमन के साथ महिला आरक्षण को जोड़ना सत्ताधारी दलों के लिए एक रणनीतिक लाभ प्रदान करता है। वर्तमान लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 15 प्रतिशत के आसपास है, जबकि राज्य विधानसभाओं में यह और भी कम है। यदि 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू किया जाता, तो बड़ी संख्या में वर्तमान पुरुष सांसदों की सीटें प्रभावित होतीं, जिससे राजनीतिक असंतोष और विरोध उत्पन्न होना स्वाभाविक था। परिसीमन के माध्यम से सीटों की संख्या बढ़ाकर इस समस्या को कम किया जा सकता है, क्योंकि नई सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है, बिना मौजूदा सांसदों को सीधे तौर पर विस्थापित किए।

इसके अतिरिक्त, परिसीमन की प्रक्रिया स्वयं में एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय है, क्योंकि यह विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के संतुलन को प्रभावित करती है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के बावजूद परिसीमन के बाद उनकी सीटों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो सकती है, जबकि उत्तरी राज्यों को अधिक लाभ मिल सकता है। इस संदर्भ में महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक व्यापक राजनीतिक समीकरण का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के हितों को संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि इस अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोई उप-आरक्षण नहीं किया गया है। यह सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कमी मानी जा रही है, क्योंकि इससे आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से अपेक्षाकृत सशक्त वर्गों की महिलाओं तक सीमित रह सकता है। इसके अतिरिक्त, यह प्रावधान राज्यसभा और विधान परिषदों पर लागू नहीं होता, जिससे उच्च सदनों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का अवसर भी सीमित हो जाता है।

इस पूरी व्यवस्था का एक और व्यावहारिक पहलू यह है कि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया में देरी होने के कारण महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ भी टलता जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि यह आरक्षण 2029 के आम चुनावों या उसके बाद ही प्रभावी हो पाएगा। इसका अर्थ यह है कि जिन महिलाओं के लिए यह अधिनियम एक आशा का स्रोत बना, उन्हें अभी भी अपने अधिकारों के लिए प्रतीक्षा करनी होगी। यह स्थिति इस प्रश्न को और अधिक प्रासंगिक बना देती है कि क्या इस प्रकार का विलंब वास्तव में आवश्यक है या इसे टाला जा सकता था।

फिर भी इस अधिनियम के सकारात्मक पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह पहली बार है जब संसद और विधानसभाओं के स्तर पर महिलाओं के लिए इतनी बड़ी संख्या में आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इससे न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया में भी उनके दृष्टिकोण और अनुभवों को स्थान मिलेगा। पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण के सकारात्मक परिणाम पहले ही देखे जा चुके हैं, जहां महिलाओं ने न केवल प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन किया है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना एक जटिल निर्णय है, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों, प्रशासनिक आवश्यकताओं और राजनीतिक रणनीतियों का मिश्रण है। इसे पूरी तरह से संवैधानिक बाध्यता कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसके वैकल्पिक उपाय संभव थे। वहीं इसे केवल राजनीतिक रणनीति कहना भी एकतरफा दृष्टिकोण होगा, क्योंकि इसमें कुछ व्यावहारिक और तार्किक आधार भी मौजूद हैं। वास्तविकता यह है कि यह निर्णय दोनों ही तत्वों का सम्मिलित परिणाम है।

भारतीय लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि वह न केवल सिद्धांतों में बल्कि व्यवहार में भी समानता और न्याय के मूल्यों को अपनाए। महिला आरक्षण इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी शीघ्रता और निष्पक्षता के साथ लागू किया जाता है। यदि इसे अनावश्यक रूप से विलंबित किया जाता है, तो यह अपने मूल उद्देश्य से भटक सकता है। इसलिए यह समय की मांग है कि इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप तैयार किया जाए, ताकि महिलाओं को उनके अधिकारों का लाभ बिना किसी देरी के मिल सके और भारतीय लोकतंत्र वास्तव में समावेशी और प्रतिनिधिक बन सके।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh