सांस्कृतिक संस्कार
संस्कारों की धूप में
पलता है मन का वृक्ष
रीतियाँ देती हैं छाँव
घर की देहरी पर
दीपक सा उजाला है
परंपरा की बात
माँ की लोरी में
सभ्यता की धुन बसती
बचपन सीख लेता
पिता के शब्दों में
अनुशासन की रेखा
जीवन बनता है
त्योहारों की भीड़ में
एकता की मुस्कान
रिश्ते जुड़ जाते
मिट्टी की खुशबू में
पहचान की जड़ें हैं
संस्कृति बोलती
गुरु के चरणों में
ज्ञान का दीप जलता
अंधकार मिटता
बुजुर्गों की छाया
अनुभव की किताब है
मार्ग दिखाती है
नदियों की धारा में
सभ्यता की कहानी
निरंतर बहती है
मनुष्य के भीतर
संस्कारों की दुनिया
शांति रचती है
— डॉ. अशोक
