वटवृक्ष की छाँव तले
वटवृक्ष की छाँव तले, यूं ‘श्रद्धा का दीप’ जलें,
सावित्री के ‘अटल-प्रण’ से जीवन फिर सँवरें।
माथे पर सिंदूर सजा, मन में प्रेम अपार लिए,
नारी ने इस व्रत से सुख के सपने सँजो लिए।
सूत्र बाँध वट के तन पर, मांगे जीवन वरदान,
पति की लंबी आयु हेतु करती पूजा व ध्यान।
सत्यवान संग निभाया, सावित्री ने धर्म महान,
यमराज से भी जीता प्रेम का अमिट सम्मान।
त्याग, तपस्या, प्रेम, समर्पण बनी हुई पहचान,
भारतीय संस्कृति के आँगन इसके सुंदर गान।
‘वट सावित्री’ का ये पर्व देता जीवन को संदेश,
सच्चे प्रेम एवं विश्वास से मिट जाते हर क्लेश।
— संजय एम तराणेकर
