लोकतंत्र की आहुति
चुनाव में कोई हारा है और कोई है जीता,लोकतंत्र की आहुति में योगदान दें सीखा।झालमुड़ी का ‘करिश्मा’ नहीं रहा हैं
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Read Moreमाँ की गोद में सोया था एक ‘नन्हा-सा’ सपना,सीने से लगाए उसे थामे थी देख रहीं तड़पना।आँखों में था डर,
Read Moreजब रिश्तों की राहों में, सवाल कई उठते हैं,दिल की खामोशी में, कुछ जवाब छुपते हैं।साथ चलना अगर दोनों की
Read Moreअंधेरे की चादर ओढ़े, बरसों से सोया हुआ था गाँव,ना दीपक, ना उजियारा, जंगल, पगडंडी और ठांव। आज़ादी के 78
Read Moreबंगाल की ‘धरती’ आज कुछ और कहती है,सदियों की ‘चुप्पी’ जैसे अब टूटती रहती है।इस हवा में घुल रहीं है
Read More‘महिला आरक्षण’ का सपना फिर अधूरा रह गया,संसद के गलियारों में सच जल की तरह बह गया।बड़ी-बड़ी बातें करने वाले,
Read Moreखामोश थीं दीवारें, पर ‘दर्द’ चीख रहा था,ये इंसान ही इंसान को नीचे गिरा रहा था। क्यों? स्त्री जननांग से
Read Moreधुएँ में घुलती चीखें व सड़कों पर बिखरा शोर,अब मुट्ठियाँ उठी हुई हैं और आँखों में है जोर।पसीने की हर
Read Moreछत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में मालती अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। पास में खड़ी
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