हास्य व्यंग्य

दोषी कोई और है, मैं नहीं

इस असार संसार में एक मात्र निर्मल प्राणी यदि कोई है, तो वह मनुष्य ही हो सकता है।इस बात को सिद्ध करने के लिए मनुष्य से अच्छा प्रमाण मिलना सम्भव नहीं है।उदाहरण के लिए यदि आपसे कोई गलत, अनैतिक,अनुचित, असामाजिक, अवैध,या देश,कानून औऱ समाज की दृष्टि में गलत कार्य जाने या अनजाने में हो जाता […]

सामाजिक

कबिरा खड़ा बजार में

देश और दुनिया का हर आदमी या औरत कोई कबीर नहीं है ;जो भरे बाज़ार खड़े होकर कहे: ‘कबिरा खड़ा बजार में,सबकी माँगे खैर। ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।। यही बात बहुत पहले से कुछ इस प्रकार कही जाती रही है: ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित […]

गीत/नवगीत

नवगीत

चादर में सोया है मटमैला गाँव। सोहर से आई है शैशव की चाँव।। अगियाने सुलगाए बैठे हैं लोग। सेज सजी दुलहे सँग दुलहिन संयोग।। शीतल है धरती तल ठहरे कब पाँव। छूना मत तन मेरा सता रही ठंड। जाग रही मधुशाला बके अंड – बंड।। साहस है उसका जो लगा दिया दाँव। चूँ -चूँ की […]

गीत/नवगीत

नवगीत

कुहरा की रातों में आया नववर्ष। प्रमुदित हैं नारी -नर लाया शुभ हर्ष।। डाली पर गाती है पिड़कुलिया गीत। सूरज भी मुस्काया डाले उपवीत।। वांछा है जन – जन का होगा उत्कर्ष। क्यारी में फूले हैं गेंदे के फूल। शीतल है मौन दबी पाँव तले धूल।। छूमंतर साजन सँग सजनि का अमर्ष। बीते दिन रातें […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

आजीवन जलदान किया है। कहलाती फिर भी नदिया है।। फूले – फले सदा परहित में, महकाती जग को बगिया है। सत्कर्मों से संत बने नर, फटे वसन को सदा सिया है। ऊपर रहे हाथ दाता का, नीचे जिसने हाथ लिया है। अपना उदर श्वान भी भरते, औरों के हित सुजन जिया है। पाता है आनंद […]

गीत/नवगीत

भैं – भैं भेड़ें करतीं

अपने – अपने रेवड़ में खुश, भैं – भैं भेड़ें करतीं। मैं – मैं बकरा – बकरी करते, और नहीं कुछ सुनना, भैंसें लड़ामनी पर रेंकें, जंजीरों में बंधना, बोलें बोली न्यारी, चट औरों की क्यारी, गायें क्यों गाएँ कजरी धुन, खड़ी फसल को चरतीं। फूट डालकर साँड़ – झुंड में, शेर उन्हें खा जाते, […]

बाल कविता

रहते सूरज इतनी दूर

रहते सूरज इतनी दूर। फिर भी दें गर्मी भरपूर।। देर नहीं पल की भी करते। अंबर में तुम नित्य विचरते।। दुनिया में फैलाते नूर। रहते सूरज इतनी दूर।। गर्मी वर्षा या हो शीत। कभी नहीं होते विपरीत।। सूर सदा रहते हैं सूर। रहते सूरज इतनी दूर।। सबसे पहले तुम जग जाते। उषा – किरण ले […]

बाल कविता

शीतकाल सौगातें लाया

शीतकाल सौगातें लाया। ठंडी ऋतु का मौसम भाया।। छोटे दिन की लंबी रातें। अगियाने पर होतीं बातें।। गरम रजाई ने गरमाया। शीतकाल सौगातें लाया।। गज़क तिलकुटी हमको भाती मूँगफली भी खूब सुहाती।। लड्डू भी माँ से बनवाया। शीतकाल सौगातें लाया।। साग चने सरसों का भाता। मक्का और बाजरा आता।। बार – बार खाया ललचाया। शीतकाल […]

बाल कविता

जाड़ा

जाड़ा! जाड़ा!! जाड़ा! जाड़ा!! गई दिवाली झंडा गाड़ा।। गर्मी वर्षा विदा हो गए। आँधी पानी कहीं खो गए।। बोला कुकड़ूँ खोले बाड़ा। जाड़ा ! जाड़ा!! जाड़ा! जाड़ा!! कहते सब उसको जड़काला। जाड़े का यह काल निराला।। पीते बाबा – दादी काढ़ा। जाड़ा ! जाड़ा!! जाड़ा! जाड़ा!! तनी दूधिया चादर भारी। दिखते वाहन नहीं सवारी।। पीता […]

गीत/नवगीत

रेवड़ी आई

मूँगफली तिलकुट्टी महकी, गज़क रेवड़ी आई। थर-थर पूस काँपता ओढ़े, दूध छाछ की चादर, धुंध कोहरा की छाई है, सूरज भाता सादर, पादप मौन खड़े हैं, छोटे या कि बड़े हैं, धीरे – धीरे फैल रही है, धूप गुनगुनी छाई। कड़री, चना ,हरे बथुआ के, स्वाद सभी को भाए, ढूँढ़ – ढूँढ़ कर ले आते […]