गीत/नवगीत

बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार

जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार।
बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार।।

खुद दलदल में धँस चुके, दें जग को उपदेश,
चेहरे पर सत्संग है, भीतर काला वेश।
जिनकी करनी चीखती, वो बाँटें संस्कार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार।।

लूट-झूठ की रोटियाँ, खाकर हुए जवान,
आज वही ईमान की, खोल रहे दूकान।
चोर दरवाज़ों से बढ़े, बन बैठे सरकार—
बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार।।

कल तक जिनके नाम पर, थूक रहा था गाँव,
आज वही चरित्र के, बाँट रहे हैं दाँव।
दर्पण भी शर्मिंदा है, सुन उनके विचार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार।।

समय बड़ा निष्पक्ष है, रखता सबका लेख,
पाप छुपे लाखों तले, सच लेता है देख।
अंत समय खुल जाएगा, हर चेहरे का सार—
जिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh