गीत/नवगीत

समझें माँ के घाव

काश दिखावे छोड़कर, समझें माँ के घाव,
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥

मातृत्व दिवस पर करें, माँ का खूब बखान,
लेकिन सूने घर पड़े, रोता उसका मान।
पूछे उसकी सिसकियां, उजड़ा उसका गाँव—
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥

माँ की सूनी आँख में, छुपे कई जज़्बात,
होठों पर खामोशियाँ, भीतर लाखों बात।
वृद्धाश्रम के द्वार पर, क्यों काँपें वे पाँव—
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥

बूढ़े काँपें हाथ जब, थक जाएँ हालात,
तब मत देना सिर्फ़ तुम, बस झूठी सौगात।
जीवन भर जो बन रही, सिर पर शीतल छाँव—
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥

मंदिर जाकर क्या मिला, क्या पाया भगवान,
यदि घर में ही रो रही, ममता की पहचान।
माँ के चरणों से बड़ी, नहीं कहीं भी छाँव—
जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh