कविताएं
- चिंतन
सुबह का अखबार,
शाम को रद्दी है
देखो देखो,
तुम्हारी भाषा कितनी भद्दी है
सुर्खियों में चीखें, भीतर सन्नाटा
चहुंओर छाया, कैसा गन्नाटा
आंकड़ों की चादर, शब्दों की मार
हर खबर में छिपा व्यापार
सुबह का अखबार,
शाम को रद्दी है
देखो देखो,
तुम्हारी भाषा कितनी भद्दी है
चाय की चुस्की संग उड़ती बातें
नेता की नीयत, जनता की थातें
मौत गिनी जाती कॉलम की लाइन में
और प्रेम दब जाता विज्ञापन में ।
सुबह का अखबार,
शाम को रद्दी है
देखो देखो,
तुम्हारी भाषा कितनी भद्दी है
शीर्षक मोटे, संवेदना पतली
प्रश्न निरुत्तर, पीड़ित घर – घर
पढ़ते-पढ़ते मन भी मैला
कागज़ सफ़ेद, पर सोच काली
सुबह का अखबार,
शाम को रद्दी है
देखो देखो,
तुम्हारी भाषा कितनी भद्दी है।
- मेरे और तुम्हारे बीच
मेरे और तुम्हारे बीच
शब्दों का पुल नहीं
सिर्फ सांसों का फासला है
जिसे नाप नहीं सकते
पर महसूस रोज़ करते हैं
कभी बहुत पास, कभी बहुत दूर
जैसे दो किनारे एक नदी के
मिलते कभी नहीं, बहते साथ-साथ ।
- प्रत्यंचा
दिल पर तनी है प्रत्यंचा
न खींच पाते, न छोड़ पाते
एक तीर अधूरा सा
सीने में ही चुभा रह जाता है
धनुष कांपता है हर धड़कन पर
आंखें निशाना साधती हैं तुझे
पर हिम्मत नहीं होती वार करने की ।
4 बीतने पर
बीतने पर समझ आता है
जो आज शोर है
कल वो सन्नाटा बन जाएगा
और हम उसी सन्नाटे को
यादों में पालेंगे
हंसी के पीछे छुपा दर्द दिखेगा
लम्हों की कीमत तब पता चलेगी
जब वो लम्हे लौट कर नहीं आएंगे ।
- समय
समय किसी का नहीं होता
न मेरा, न तुम्हारा
वो बस बहता है
और हमें अपने साथ
बदलता हुआ छोड़ जाता है
कभी मरहम, कभी ज़ख्म बनकर
कुछ चेहरों को धुंधला कर देता
और कुछ बातों को अमर ।
6 तुम हो तो
तुम हो तो
उजड़े आंगन में भी सावन है
सूखे होंठों पर भी गीत है
और रातों में चांद का होना
ज़रूरी लगता है
तुम्हारी हंसी से रौशन दीवारें
तुम्हारे नाम से धड़कते लम्हे
तुम हो तो हर अधूरापन मुकम्मल ।
- निर्वासित
शहर में रहकर भी निर्वासित हूँ
अपने ही घर में अजनबी
भीड़ में तन्हा
और अपने ही शब्दों से
बेदखल
न कोई पूछता, न कोई सुनता
अपनी ही परछाई से डर लगता
खुद को ही खुद से दूर पाता हूँ ।
- सूखते चिनार
सूखते चिनार गवाह हैं
उस झील के
जहाँ कभी परछाइयाँ मिला करती थीं
अब सिर्फ पत्ते गिरते हैं
और यादें सरसराती हैं
डालियाँ नंगी, तना उदास
हवा भी अब गीत नहीं गाती
बस खामोशी ओढ़े खड़े हैं।
— विकास कुमार शर्मा
