ग़ज़ल
लूंगा वही जो मिलेगा सीधी राह से
तौबा मैंने कर ली है अब तो गुनाह से
करके अदा शुक्रिया ही घर को आ गया
गया तो था मैं मांगने आलमपनाह से
कोयले की दलाली अगर करते नहीं तुम
दाग पैरहन पे फिर क्यों हैं स्याह से
आज तलक एक भी पूरा नहीं हुआ
काम मैंने जो किया तेरी सलाह से
कुछ इसलिए भी महफिलों में जाता नहीं अब
दिल उठ गया है मेरा झूठी वाह वाह से
— भरत मल्होत्रा
