छुट्टियाँ और रेल का सफ़र
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
सफ़र की शुरुआत रेलवे स्टेशन से नहीं, बल्कि घर के उस कच्चे आंगन से होती थी जहाँ बोरिया-बिस्तर बाँधे जा रहे होते थे। पड़ोसी पूछते कहां जा रहे हो जल्दी अज़ान अच्छा नहीं लगेगा सुना आंगन,ये थी उस दौर की मोहब्बतें, ओर अपना पन,गांव वाले कहते चलो हम भी मदद कर देते है समान लेजाने में,गाँव की वह आख़िरी सुबह हमेशा कुछ भारी सी होती थी। घर के बुज़ुर्गों के पैर छूना, पड़ोसियों का दुआएं देना और पीछे छूटते नीम के पेड़ों को हाथ हिलाते हुए विदा कहना,एक गहरा अहसास था। गाँव की ठंडी हवा और तांगे के हिचकोले खाते हुए जब हम छोटे से स्टेशन पहुँचते, तो कपड़ों पर जमी वह गाँव की धूल हमारे साथ एक पहचान बनकर चलती थी।
स्टेशन पहुँचते ही एक अलग दुनिया सामने होती। वह पीली रोशनी वाला प्लेटफॉर्म और लोहे के वे भारी संदूक (ट्रंक), जिन पर घर का पता बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता था। उन संदूक के ऊपर बैठकर हम भाई-बहन ट्रेन का इंतज़ार करते, जबकि पापा कुली से मोल-भाव करने और मम्मी हमारा सामान सहेजने में व्यस्त रहतीं। वह इंतज़ार थकाने वाला नहीं, बल्कि उम्मीदों से भरा होता था।तभी दूर क्षितिज पर काला धुआं दिखाई देता और भाप के इंजन की वह गूंजती हुई सीटी दिल की धड़कनें बढ़ा देती। जब वह विशालकाय इंजन ज़मीन को थर्थराता हुआ प्लेटफॉर्म पर आकर रुकता, तो हवा में कोयले की सोंधी महक घुल जाती। डिब्बे में चढ़ने की वह आपाधापी, भीड़ के बीच अपनी जगह बनाना और आख़िर में उस जादुई ‘खिड़की वाली सीट’ को पा लेना,यही हमारे बचपन की सबसे बड़ी जीत थी।
जैसे ही ट्रेन अपनी धीमी रफ़्तार से चलना शुरू करती, खिड़की के बाहर का मंज़र किसी फिल्म की तरह बदलने लगता। पीछे भागते बिजली के खंभे, हाथ हिलाते हुए चरवाहे और लहलहाते खेत,ऐसा लगता मानो पूरी दुनिया हमारे साथ दौड़ रही है। जब ट्रेन किसी विशाल नदी के ऊंचे पुल से गुज़रती, तो पटरियों की वह ‘धड़-धड़’ वाली आवाज़ हमारे उत्साह को दोगुना कर देती थी। हम बच्चे खिड़की से नीचे बहती नदी में इस उम्मीद के साथ सिक्का फेंकते कि हमारी हर मासूम मुराद पूरी हो जाए।
सफ़र का सबसे ख़ुशनुमा पड़ाव तब आता जब मम्मी वह कपड़े की पोटली या एल्युमीनियम का डिब्बा खोलती थीं। घर के बने परांठे और आम के अचार की खुशबू पूरे डिब्बे में फ़ैल जाती। साथ बैठे अजनबी मुसाफ़िर भी उस स्वाद का हिस्सा बन जाते और सफ़र की थकान जैसे पलों में ग़ायब हो जाती। पापा का ऊपर वाली बर्थ पर पहरा देना और हमारा मम्मी के साये में महफूज़ सो जाना,वह नींद दुनिया के किसी भी मख़मली बिस्तर से कहीं ज़्यादा गहरी थी।सुबह होते ही खिड़की के बाहर का नज़ारा बदलने लगता। हरियाली की जगह अब कंक्रीट के जंगल, ऊंचे कारखाने और पटरियों का जाल बिछने लगता। यह शहर की आहट थी। जंक्शन पर उतरते ही वह हज़ारों अजनबियों की भीड़ और लाउडस्पीकर का शोर हमें थोड़ा डराता ज़रूर था, लेकिन पापा का मज़बूत हाथ थामे हम बेख़ौफ़ आगे बढ़ जाते।
गाँव की वह शांति पीछे छूट गई थी और सामने संभावनाओं से भरा एक नया शहर था। आज हम ज़िंदगी की दौड़ में बहुत आगे निकल आए हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में वह छुक-छुक करती ट्रेन, मम्मी-पापा का वह हाथ और खिड़की से आती कोयले की महक आज भी ज़िंदा है। वह सफ़र महज़ एक दूरी नहीं, बल्कि संस्कारों और यादों का एक अटूट सिलसिला था।
