डायरी के पन्ने
”वो चेहरा… महज़ एक चेहरा नहीं था, बल्कि मेरे दिल की पूरी ज़मीन का मरकज़ , यानी केंद्र बन गया था। उसे पहले यहाँ कभी नहीं देखा था, मगर जिस घड़ी उस पर नज़र पड़ी, बरसों से पाले गए मेरे मज़बूत इरादे किसी रेत की दीवार की तरह ढह गए।
मेरी इस डायरी के पन्ने सिर्फ काग़ज़ नहीं, एक आईना हैं। जब तुम इन्हें पलटोगे और इसमें ख़ुद को तलाश करोगे, तो तुम्हें अपनी ही धड़कनों की गूँज सुनाई देगी। क्योंकि इश्क़, मोहब्बत और प्यार… तुम इसे किसी भी नाम की ज़ंजीर में बाँध लो, ये वो जज़्बा है जो रूह में एक ही तरह उतरता है।
इसका अंजाम कभी आँखों की चमक है, तो कभी पलकों की नमी मगर ये सुकून और ये दर्द इंसान के अपने बस में कहाँ? हम ग़ुमान करते हैं कि हम आज़ाद हैं, पर सच तो ये है कि हम सिर्फ़ जिस्म की हद तक मुख़्तार हैं मालिक हैं,बस.. जहाँ बात दिल की आती है, वहाँ मुसाफ़िर हमेशा अपने मुक़द्दर के ही ग़ुलाम होते हैं।”
मोहब्बत की कहानी अक्सर वहाँ जाकर टूट जाती है, जहाँ हम सोचना भी नहीं चाहते। ज़्यादातर दिल जो इश्क़ कर बैठते हैं, बाद में टूटकर बिख़र जाते हैं, जैसे हवा के झोंके में सूखा पत्ता। मेरा प्यार भी अधूरा रहा, लेकिन मैं मानता हूँ कि सच्ची मोहब्बत न वक्त की मोहताज होती है, न जात-पात की, न उम्र की, न दिन-रात की। दुनियावी रस्में और सरहदें उसे बांध नहीं सकतीं। तारीख़ें गवाही देती हैं कि कई मोहब्बतें जुदाई में भी मुकम्मल रही हैं। मगर इस सिलसिले में मेरी किस्मत बहुत तल्ख (कड़वी) निकली। मैंने कई रातें और कई दिन ख़्वाबों के महल बनाने में बिताए, लेकिन जब वो ख़्वाब हक़ीक़त के संगरेजों (कंकड़ों) से टकराए, तो मेरा वज़ूद भी बिख़र गया। लोगों की ज़ुबान ने मुझे पागल कह दिया। वक्त के मरहम ने ज़ख्मों के ऊपरी निशान को तो भर दिया, मगर मोहब्बत के वो निशान अब भी ज़िंदा हैं। कभी-कभी उनका एहसास मुझे पकड़कर माज़ी (अतीत) में ले जाता है, उस जगह जहाँ मैंने उसे पहली बार देखा था। अल्लाह गवाह है, वो पहली नज़र भी उसकी उफ़ किस बला की थी, दिल पर हैं चोट आज भी हम वो ही लिए हुए,
वो लम्हा हाय,मोहब्बत के दरीचे (खिड़की) से छनकर आया, जिसमें सुकून भी था और दर्द भी, बहार भी और पतझड़ का अहसास भी। वो सर्दियों के दिन थे, जब गलियों में ठंडी हवाएं बेफ़िक्री से इठलाती फिरती थीं। उन दिनों मैं इस शहर के एक मक़ामी स्कूल में मास्टर था। छुट्टी का वक्त क़रीब था कि अचानक मैंने खिड़की के बाहर से झांकता एक ख़ूबसूरत हसीन चेहरा देखा, एक लड़की, जिसकी आँखों में अद्भुत चमक थी। मैंने सोचा ये कौन है, पहले तो इसे यहाँ कभी नहीं देखा। उसी पल उसकी नज़र मेरी नज़र से टकराई, और वो शरमाते हुए अपनी पलकें झुका गई, जैसे मेरी आँखों में उतर जाने से डर रही हो, या शायद इसीलिए उतर रही हो कि वहाँ हमेशा के लिए ठहर जाए। इतने में, मेरे साथ पढ़ाने वाले एक टीचर सलीम साहब और उनकी बीवी, जो शहर के दूसरे स्कूल में अध्यापिका थीं, स्कूल की ओर आते दिखाई दिए। उनकी स्कूल का रास्ता मेरे स्कूल के सामने से ही होकर गुज़रता था। उस जमाने में सभी स्कूल तक पैदल ही जाया करते थे, बाइक का ज़माना नहीं था, उस वक्त उनसे पूछना मुनासिब न समझा। छुट्टी का वक्त हो चुका था, बच्चे अपना बस्ता संभाल रहे थे, और वो लड़की उन्हीं बच्चों के साथ खड़ी थी। मैंने सोचा शायद ये किसी के घर-बाहर से आई कोई मेहमान हो। बात आई-गई हो गई। मगर अगले दिन, लगभग उसी वक्त, मैंने उसे फ़िर देखा। इस बार मैंने दिल की बेचैनी को दबा न सका और सलीम साहब से उसके बारे में पूछ ही लिया। वो मुस्कुराते हुए बोले, ‘अरे, ये तो मेरी बीवी की छोटी बहन है। हाल ही में यहाँ हिंदी गवर्नमेंट मिडिल स्कूल में दाखिल हुई है, बहुत तेज है, हमारे शहर से आई है। और मैं सोच रहा था कि चूंकि तुम्हारा मैथ्स और साइंस का हाथ बहुत अच्छा है, तो क्यों न तुम इसे पढ़ा दिया करो।’ उस वक्त मेरे दिल में जैसे चुपके से एक सितारा गिर हो, मगर होंठों पर बस इतना आया, ‘देखते हैं, वक्त मिला तो ज़रूर।’ मैंने थोड़ा ना-नुकुर किया, मगर सलीम साहब ने इसरार (आग्रह) किया, ‘भाई, ज़रा वक्त निकाल दो, अपने ही घर की बात है।क्या तुम हमें अपना नहीं मानते?’ और मैंने हालात को ग़नीमत समझते हुए हामी भर दी। शुरू में हमारी मुलाक़ातें सीमित थीं, सवाल-जवाब, गणित के फ़ार्मूले, विज्ञान की बातें, मगर इन लफ़्ज़ों के पीछे बहता था एक ख़ामोश दरिया जो दोनों के दिलों तक पहुँचता था। वो पढ़ाई में तेज़ थी, मगर अक्सर नजरें झुका लेती। जब कभी मेरी ओर देखती, तो दिल में जैसे मौसम बदल जाता, कभी बसंत की नर्मी, कभी सावन की रिमझिम, कभी पतझड़ का सूना पन। दिन गुज़रते गए और हमारी मोहब्बत किताबों के पन्नों के बीच पलने लगी। अनकहे इक़रार का आलम ये था कि एक सवाल पूछते वक्त उसका हाथ अचानक मेरे हाथ से छू जाए तो मेरी रूह में हलचल दौड़ जाती, और वो हलचल कई दिनों तक मेरे साथ रहती। मगर मोहब्बत के आसमान पर बादल जमा होने लगे थे। एक दिन सलीम साहब की बीवी ने अनायास कहा, ‘हमने इसका रिश्ता अपने ख़ानदान में तय कर दिया है, अगली बसंत में निकाह होगा।’ उस लम्हे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी सांसें खींच ली हों, जैसे सारे ख़्वाब किसी ने बेरहमी से तोड़कर रौंद दिए हों। वो चुप खड़ी थी, उसकी आँखों में एक सैलाब कैद था, मगर लब ख़ामोश थे। निकाह से एक रोज़ पहले, वो आख़िरी बार पढ़ाई के बहाने आई। हमने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, बस निगाहें मिलीं और रूहों ने एक-दूसरे को ख़ामोशी से अलविदा कह दिया। मैंने अपनी डायरी से एक पन्ना निकालकर उसे दिया, जिस पर लिखा था, ‘अगर मोहब्बत सच्ची हो, तो जुदाई सिर्फ़ जिस्मों की होती है, रूहें हमेशा साथ रहती हैं।’ और वो पन्ना उसने सीने से लगाकर रख लिया, फ़िर बिना पीछे मुड़े चली गई। उसके बाद वक्त-दर-वक्त ने अपनी रफ़्तार दिखा दी। तीस साल यूँ गुजर गए जैसे हवा का झोंका। जिंदगी ने अनेक मोड़ दिए, लेकिन मेरे दिल का एक कोना हमेशा उसी लम्हे में ठहरा रहा, जहाँ पहली बार उसकी आँखों ने मेरा नाम लिखा था। अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि आज भी मेरे पास उसका मोबाइल नंबर है। कई बार हिम्मत करके कॉल किया, मगर जैसे ही ‘हैलो’ की आवाज़ आई, दिल ने साथ छोड़ दिया और मैंने जल्दी से कह दिया, ‘गलत नंबर’ और फ़ोन काट दिया। शायद डर था, कि कहीं मैं उसकी ज़िंदगी में एक अनचाही दस्तक न बन जाऊं, शायद ये भी कि मोहब्बत अगर पाक है, तो उसकी ख़ामोशी ही उसकी सबसे ख़ूबसूरत शक़्ल है। इन तीस वर्षों में, दिल में बस यही ख़्वाहिश रही, एक बार उसे देख लेना, बस एक बार, न कोई शिकायत, न कोई सवाल, बस उसकी आँख़ों का वो सुकून फिर महसूस कर लेना। मैं आज भी कभी उसकी सहेलियों, कभी रिश्तेदारों से उसका हाल पूछ लेता हूँ। अगर कोई पुरानी तस्वीर मिल जाती है, तो दिल फ़िर से जवान हो जाता है। शायद यही मोहब्बत का हासिल है, दिल जलता रहा, मगर रोशनी देता रहा। जुदाई सिर्फ़ जिस्मों की रही, रूह तो आज भी उसी का तवाफ़ करती है। और अब मेरी डायरी का ये आख़िरी सफ़ा भी उसी के नाम है। मेरी मोहब्बत, जो मुक़द्दर में न थी, मगर हमेशा मेरी रही। अधूरी मोहब्बत, यादों की ज़ंजीरों में क़ैद हो गई। मोहब्बत एक ऐसा जज़्बा है जो पूरा होने की शर्त पर नहीं, बल्कि सच्चे एहसास की गहराई पर ज़िंदा रहता है। कुछ मोहब्बतें मंज़िल तक नहीं पहुँच पातीं, फिर भी उनकी गूँज उम्र भर दिल और ज़ेहन में तैरती रहती है। वो वादे जो कभी पूरे न हो सके, वो ख़्वाब जो आँखों में ही टूट गए, और वो लम्हे जो वक्त की रफ़्तार में पीछे छूट गए, दिल उन्हें भुलाने के बाद भी अपने अंदर सहेज़े रखता है। वो मोहब्बत जो मिल न सकी, इश्क़ अधूरा ही रहा, इन अल्फाज़ों में वो दर्द दबा है जो वक्त बीत जाने के बाद भी कम होने का नाम नहीं लेता। शायद तक़दीर ने साथ न दिया, हालात न रहे बदल गए, मगर दिल वहीं ठहरा गया, जहाँ कभी चाहत ने जन्म लिया था। क़समें, वादे और ख़्वाब, सब बेमानी लगने लगे जब मंज़िल न मिल सकी। वो हर लम्हा जो कभी दो दिलों के बीच पिरोया गया था, अब सिर्फ़ यादों की तस्वीर बनकर रह गया। फिर भी क्यों वो चेहरे, वो आवाज़ें, वो लम्हे ज़ेहन से मिटते नहीं? क्यों हर रात चाँद को देखकर दिल ये चाहता है कि वो उनको पैग़ाम पहुँचा दे,जैसे कोई चकोर चाँद के दीदार का प्यासा हो। जब मोहब्बत अधूरी रह जाए, तो वो एक रोग बन जाती है, न जीने देती है, न मरने। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है, मगर दिल के किसी ख़ामोश कोने में वही मासूमियत रहती है, जो कभी महसूस की थी। दिल धड़का था,शायद इसीलिए कहा जाता है, कुछ यादें उम्र की क़ैद होती हैं, और कुछ चेहरे वक्त की धूल में भी नहीं मिटते। चाहे वो मोहब्बत कभी मुकम्मल न हुई हो, लेकिन उसकी पवित्रता और बेनियाज़ी आज भी रूह को छू जाती है। यह इश्क़ की नाकामी नहीं, बल्कि उसकी शिद्दत की जीत है कि वो आज भी दिल में जिंदा है। और ता क़यामत रहेगी।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज़
