आप आज जो बीज बोएंगे, बुढ़ापे में वही फसल आपको काटनी होगी
आज का युग दिखावे, तकनीक और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की अंधी दौड़ का युग है। इस दौड़ में हम इतनी दूर निकल गए हैं कि हमें उन कंधों का अहसास ही नहीं रहा, जिन पर बैठकर हम आज इतने बड़े हुए हैं,कहां गए वो अहसास, कहां है माता पिता का अस्तित्व जो आपके भविष्य की नींव में लगा चुका है,आज मेरी निगाहों से ये पंक्तियां गुज़रीं,”कभी वक्त मिले तो अपने माता-पिता के चेहरों को देखना, तुम्हें अहसास होगा कि तुम्हारा भविष्य बनाते-बनाते वे खुद कितना टूट चुके हैं।”
एक संतान जब अपनी पहली सैलरी, अपनी बड़ी डिग्री या अपने नए घर का जश्न मनाती है, तो उसे अक्सर अपनी ही मेहनत दिखाई देती है। लेकिन उस सफ़लता के पीछे पिता की वह फटी हुई बनियान होती है जिसे उन्होंने कभी नहीं बदला, माँ की वह सेहत होती है जो रसोई के धुएं और परिवार की चिंता में घुल गई। उन्होंने अपनी हर इच्छा का गला घोंटा ताकि आपकी हर ज़िद पूरी हो सके। उनके चेहरे की झुर्रियां उम्र का तकाज़ा नहीं, बल्कि उन क़ुर्बानियों के निशान हैं जो उन्होंने आपकी मुस्कान के लिए दीं।
बहस में जीतना नहीं, झुकना ही महानता है,
दूसरी बड़ी बात जो हमें सीखनी चाहिए,”दुनिया के हर शख़्स से मुक़ाबला करो, मगर जब मुकाबला गुरु या माता-पिता से हो, तो पीछे हट जाओ।”
आजकल की पीढ़ी ‘लॉजिक’ और ‘आधुनिकता’ के नाम पर अपने माता-पिता से बहस करती है, उन्हें ‘पुराने ख़यालात’ का कहकर चुप करा देती है। याद रखिए, माता-पिता से बहस जीतना आपकी सबसे बड़ी नैतिक हार है।
विनम्रता का नियम क्या है?गुरु और माता-पिता दुनिया की वो एकमात्र हस्तियां हैं जो आपको ख़ुद से भी आगे निकलता देख कर ख़ुश होते हैं। उनके सामने हार मान लेना दरअसल आपकी परवरिश की जीत है। उनसे पीछे हट जाना कायरता नहीं, बल्कि उस क़र्ज़ का छोटा सा सम्मान है जो आप कभी चुका नहीं सकते।
आज की पीढ़ी के लिए ‘इब्रत’ (चेतावनी) है ये,
यह शब्द आपको केवल भावुक करने के लिए नहीं है, बल्कि यह एक ‘चेतावनी’ है। याद रखिए, समय का चक्र कभी नहीं रुकता।जो युवा आज अपने माता-पिता की थकान का मज़ाक़ उड़ाते हैं या उनकी ज़रूरतों को बोझ समझते हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि कल वे भी इसी मोड़ पर खड़े होंगे।
आज आप जवान हैं, आपके पास ताक़त और शब्द हैं। लेकिन कल आपकी भी कमर झुकेगी और आपकी आवाज कांपेगी। जैसा बर्ताव आज आप अपने बुज़ुर्गों के साथ कर रहे हैं, वही ‘संस्कार’ आपकी संतान आपसे सीख रही है। आप आज जो बीज बोएंगे, बुढ़ापे में वही फसल आपको काटनी होगी।
क़ुदरत का कानून है ‘जैसा करोगे, वैसा भरोगे’
यही क़ानून-ए-फ़ितरत (कुदरत का कानून) है।” दुनिया में हर चीज़ का बदला मिल सकता है, लेकिन माता-पिता का अपमान एक ऐसा क़र्ज़ है जिसका ब्याज इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। उनकी आंखों से गिरा एक भी आंसू आपकी पूरी सफलता को राख कर सकता है।
हमारा कर्तव्य कुछ तो बनता होगा उनके प्रति,
सच्ची कामयाबी केवल ऊंचे पदों पर पहुंचना नहीं है, बल्कि अपने बूढ़े माता-पिता की आंखों में वह सुकून देखना है जिसे देखकर उन्हें लगे कि उनके जीवन का संघर्ष सफल रहा। उनकी सेवा कोई ‘एहसान’ नहीं, बल्कि ख़ुद के बुढ़ापे को सुरक्षित करने का एक निवेश है।
जिनके माता-पिता ख़ुश हैं, उनका ख़ुदा और उनकी क़िस्मत दोनों उनसे ख़ुश हैं। उनसे मुक़ाबला मत कीजिए, उनकी परछाई बनकर उनका सहारा बनिए।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
