वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला
क्या खूबसूरत विषय दिया है- ‘ वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला’. सचमुच वो दिन
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Read Moreमै आम बोल चाल की भाषा में लिखता हूँ। ठेठ लोकभाषा से सजी हुई रचनायें होती है। आम जनमानस में
Read Moreबचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही
Read Moreआज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले
Read More— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ सफ़र की शुरुआत रेलवे स्टेशन से नहीं, बल्कि घर के उस कच्चे आंगन से
Read Moreआज एक लंबे अरसे के बाद मन के द्वार पर फिर उसी सुंदर क्षण ने दस्तक दी है। वह एक
Read Moreमैं हिंदी में अगर सबसे ज्यादा किसी साहित्यकार को पसंद किया तो वे मुंशी प्रेमचंद जी हैं। उनकी कहानियों को
Read Moreहमारी स्मृतियों की नदी जब बहती है, तो वह केवल शब्दों को नहीं, बल्कि एक पूरे कालखंड को जीवंत कर
Read More”वो चेहरा… महज़ एक चेहरा नहीं था, बल्कि मेरे दिल की पूरी ज़मीन का मरकज़ , यानी केंद्र बन गया
Read Moreवो मेरे पिता के दोस्त थे, बहुत बड़े किसान और साहूकार। उनका नाम सुखदेव सिंह था। बहुत ही बड़ी हवेली।
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