संस्मरण

संस्मरण – मेरी ठेठ लोकभाषा से सजी रचनायें होती हैं

मै आम बोल चाल की भाषा में लिखता हूँ। ठेठ लोकभाषा से सजी हुई रचनायें होती है। आम जनमानस में जो प्रचलित शब्द या मुहावरे होते हैं। अवधी हिंदी व भोजपुरी का मिश्रण रहता है। पढ़ने पर आप ऐसा महसूस करेंगे कि ये बातें हमारे आस-पास, हमारे मोहल्ले गलियों की बातें जो बिल्कुल लोगों की आत्मा को हिला कर रख देता है। 

शुध्द हिंदी लिखने वाले को हमारे लेखन में शब्द, वाक्य तथा व्याकरण की कमी महसूस करा देगी। वे बरबस कह उठेंगे कि व्याकरण में त्रुटि है। शुध्द शब्द नहीं लिखा गया है। अगर मैं अपने लेखन में शुध्द हिंदी में कोई रचना लिख दूँ तो शायद वह उतनी गहरी छाप नही छोड़ेगा जितनी ठेठ, आमजन के बीच प्रचलित शब्दों, वाक्यों से लबरेज मेरी रचनायें गहराई तक उतर जाती हैं। 

एक जीवंत रचना बनाने के लिये आम बोलचाल में प्रयुक्त शब्दों का इस्तेमाल करता हूँ जो सरकारी शब्दकोश में मिलना मुश्किल है। यही वजह होती है जिससे लोगों के अंदर एक उत्कंठा बनी रहती है कि अगली रचना में किन नये शब्दों या मुहावरों या गांव घर से निकलने वाले शब्द शामिल किये गये हैं। 

आमजन के मुख से निकलने वाले शब्दों को उसी रूप में बिना लागलपेट किये वैसे ही रखने की कला होने से वह रचनाकार एक लोकप्रिय रचनाकार माना जाता है। मैं चाहता हूँ कि मैं सदैव ऐसी रचना दूं ताकि लोगों को महसूस हो कि यह लेखक अपनी बात कर रहा है। अपनी आवाज उठा रहा है। बिना घूस लिये, बिना तोड़े-मरोड़े साफ-साफ लिख रहा है। 

मेरी रचनायें जरूर तीखी होती है। शब्दों, वाक्यों तथा प्रचलित मुहावरों से मन को बेधने वाला जरूर होता है लेकिन सच उगलती है। सामाजिक गंदगी को बिना रूके चीरफाड़ शुरू कर देती हैं। नये ढंग से पोस्टमार्टम करती हैं। एक अलग शैली में होती है। एक अलग अंदाज में ंहोती है जो हंसाती तो है और सोंचने को मजबूर भी करती है। 

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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