वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला
क्या खूबसूरत विषय दिया है- ‘ वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला’. सचमुच वो दिन चिर स्मरणीय दिन हैं. भारत-विभाजन के समय मैं एक साल की मां की गोद में भारत आई थी. उस समय बिजली का बहुत बुरा हाल था. या तो बिजली होती ही नहीं थी या फिर आए दिन गुल रहती थी.
उन दिनों एकमंजिले घर के आगे बहुत बड़ा वेड़ा होता था और अंदर बहुत बड़ा-सा आंगन साथ ही छत पर जाने के लिए सीढ़ियां. दिन में एक तो बिजली कम ही जाती थी, जाती थी तो अंदर-बाहर के वेड़ों में चारपाइयां लगाकर हाथ का पंखा झलने से काम चल जाता था. रात को बिजली गुल तो फिर अंदर-बाहर के वेड़ों में या छत पर मेला लग जाता था. छत पर छोटी-छोटी दीवार होती थी, तो साथ वाले घर के बच्चे भी आ जाते थे. छत पर पानी का छिड़काव करते थे, सूखने पर वहीं बिस्तर बिछाकर सो जाते. रात को बारिश आ गई तो अपना-अपना बोरी-बिस्तर उठाकर खटाखट सीढ़ियां उतरकर घर के अंदर आकर सो जाते.
कभी दादा-दादी परियों की और राजा-रानी की कहानियां सुनाते थे, कभी कोकला छिपाके… खेल खेलते थे, कभी अंत्याक्षरी की महफिल जमा करती थी.
सर्दियों में मम्मी अपनी अंगीठी बड़े-से कमरे में ही ले आती थीं. वो रोटी पकाती जातीं और हम सब गरमागरम रोटियां खाते जाते, फिर गरम रजाई में ही दुबक कर कहानियों और अंत्याक्षरी का आनंद लेते. लालटेन की रोशनी में भी हमें कभी बिजली गुल होने का दुःख नहीं सालता था.
तब सब असली था, अब तो ए.सी. की सर्दी भी नकली और गर्मी भी!
— लीला तिवानी
