चूल्हा पूछे रोटियाँ
वादों की ऐसी फसल, उगती बारंबार।
कटती सदा चुनाव में, जनता हो लाचार।।
भाषण में खुशहाल है, कागज़ पर त्योहार।
चूल्हा पूछे रोटियाँ, कब आएगी यार?।।
कुर्सी जैसे कल्पतरु, सबकी पहली चाह।
नीति-वचन पीछे रहें, आगे सत्ता-राह।।
सच का दीपक हाथ में, लेकर निकला गाँव।
झूठी आँधी रोकने, कितने आए पाँव?।।
जनता के इस ताज को, नेता समझें माल।
सिंहासन पर बैठते, भूल गए चौपाल।।
दिखला दे जो आईना, बन जाता अपराध।
प्यारा इनको लगे, अपना ही संवाद।।
सत्ता का मद चढ़ गया, भूल गए सम्मान।
जिस सीढ़ी ऊपर गए, काट रहे पायदान।।
कुर्सी के इस खेल में, रिश्ते कर नीलाम।
जनता केवल मोहरा, बाकी अपना काम।।
जनता जागेगी तभी, टूटेगा हर जाल।
झूठ मुखौटे गिर पड़ें, सच होगा खुशहाल।।
लोकतंत्र की शक्ति है, जनता का अधिकार।
सजग रहे जो नागरिक, सोचे तब सरकार।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
