जेन जी का वैश्विक आक्रोश और भारत की अलग राह
सत्ता परिवर्तन की लहरों के बीच भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक स्थिरता और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका
समकालीन विश्व एक महत्त्वपूर्ण पीढ़ीगत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। डिजिटल युग में जन्मी और पली-बढ़ी जेन जी आज केवल तकनीक के उपयोग तक सीमित पीढ़ी नहीं रह गई है, बल्कि वह शासन, सत्ता, सामाजिक न्याय और अपने भविष्य की दिशा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। वर्ष 2024 से 2026 के दौरान विश्व के अनेक देशों में युवाओं के नेतृत्व में जनआंदोलनों की एक उल्लेखनीय लहर देखने को मिली है। एशिया में बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया, श्रीलंका, केन्या के निकटवर्ती क्षेत्र सहित फिलीपींस, तिमोर-लेस्ते, मालदीव और मंगोलिया; अफ्रीका में केन्या, मेडागास्कर, मोरक्को, तंजानिया, टोगो और अंगोला; यूरोप में सर्बिया, फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, अल्बानिया, ग्रीस, बुल्गारिया, स्लोवाकिया और जॉर्जिया; तथा लैटिन अमेरिका में पेरू, मेक्सिको और पैराग्वे जैसे देशों में युवाओं के आंदोलनों ने राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित किया है। इन सभी देशों में आंदोलनों का स्वरूप और कारण एक जैसे नहीं रहे हैं। कहीं युवाओं ने नेतृत्व किया, तो कहीं वे व्यापक जनआंदोलनों की प्रमुख शक्ति बने। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महँगाई, राजनीतिक संरक्षणवाद, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे प्रश्न इन आंदोलनों के केंद्र में रहे हैं। कुछ देशों में इन आंदोलनों ने सरकारों के पतन और सत्ता परिवर्तन तक की परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं, जबकि अन्य देशों में वे अभी भी नीतिगत सुधार और राजनीतिक जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। वस्तुतः यह केवल किसी एक पीढ़ी का असंतोष नहीं, बल्कि बदलती दुनिया में शासन व्यवस्था और नागरिक अपेक्षाओं के बीच उभरते तनाव का वैश्विक प्रतिबिंब है।
इस वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत अलग दिखाई देती है। यहाँ भी युवाओं के सामने रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, महँगाई और भविष्य की अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियाँ हैं, लेकिन विदेशों की तरह व्यापक और आक्रामक युवा आंदोलन का प्रभाव दिखाई नहीं देता। भारत में जेन जी की आवाज विभिन्न मुद्दों पर अवश्य उठी है, किंतु वह किसी एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन अथवा व्यापक सत्ता परिवर्तन की माँग में परिवर्तित नहीं हो सकी। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय युवा अपेक्षाकृत संतुष्ट है अथवा भारतीय सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था ने असंतोष को अभिव्यक्ति देने तथा उसका समाधान खोजने के ऐसे रास्ते विकसित किए हैं, जिनके कारण परिस्थितियाँ दूसरे देशों से भिन्न बनी हुई हैं?
इसका उत्तर भारत की सामाजिक संरचना और लोकतांत्रिक परंपराओं में खोजा जा सकता है। भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता के बावजूद सामाजिक निरंतरता और सामुदायिक जीवन की मजबूती है। परिवार, समाज, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन और स्थानीय संस्थाएँ व्यक्ति के विचार तथा व्यवहार को प्रभावित करती हैं। यहाँ असहमति के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा भी रही है। समस्याओं के समाधान के लिए सड़क पर उतरना ही एकमात्र विकल्प नहीं माना जाता, बल्कि संवाद, जनप्रतिनिधियों से संपर्क, सामाजिक संगठनों की भूमिका और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से भी अपनी बात रखने के अनेक अवसर उपलब्ध हैं।
भारत में जेन जी आंदोलन के व्यापक स्वरूप न ले पाने का एक प्रमुख कारण युवाओं की समस्याओं और प्राथमिकताओं का विविध होना भी है। किसी के लिए रोजगार सबसे बड़ा प्रश्न है, किसी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, किसी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और किसी के लिए उद्यमिता एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता। इन सभी मुद्दों को एक साझा राष्ट्रीय आंदोलन में बदलना आसान नहीं है। इसके अतिरिक्त भारतीय युवाओं का एक बड़ा वर्ग अपनी शिक्षा, करियर, परिवार और व्यक्तिगत भविष्य के निर्माण को प्राथमिकता देता है। राजनीतिक विचारधाराओं और विभिन्न संगठनों से जुड़ाव भी युवा समुदाय को अलग-अलग मंचों में विभाजित करता है।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष पिछले कुछ दशकों में भारत में हुए आर्थिक, तकनीकी और आधारभूत विकास का है। सड़क, रेल, बिजली, संचार, डिजिटल सेवाओं, बैंकिंग और सरकारी सुविधाओं तक सामान्य नागरिक की पहुँच में विस्तार हुआ है। डिजिटल भुगतान से लेकर सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन स्वरूप तक, अनेक बदलावों ने नागरिक जीवन को प्रभावित किया है। समाज का एक बड़ा वर्ग इन परिवर्तनों को सकारात्मक उपलब्धि के रूप में देखता है। अनेक लोगों की यह धारणा है कि आज उपलब्ध सुविधाएँ और अवसर पूर्ववर्ती दशकों की तुलना में बेहतर हुए हैं। वर्तमान में जो सुविधाएँ और विकास के अवसर मिल रहे हैं, उन्हें भी बड़ी आबादी महत्त्वपूर्ण मानती है। इस कारण व्यवस्था के प्रति असंतोष होने के बावजूद वह किसी एक व्यापक और एकजुट जनआक्रोश में परिवर्तित नहीं हुआ है। हालाँकि इसे अधिकांश नागरिकों की पूर्ण संतुष्टि का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने भी इस स्थिति को प्रभावित किया है। राजनीतिक नेतृत्व ने युवाओं की बदलती अपेक्षाओं और जनभावनाओं को समझते हुए रोजगार, कौशल विकास, उद्यमिता, डिजिटल सशक्तीकरण, शिक्षा और आधारभूत सुविधाओं जैसे विषयों को अपने राजनीतिक विमर्श तथा सरकारी कार्यक्रमों में स्थान दिया है। केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-अपनी नीतियों एवं योजनाओं के माध्यम से जनता की अपेक्षाओं को संबोधित करने का प्रयास करती रही हैं। चुनावों के माध्यम से नागरिकों को सरकारों का मूल्यांकन करने, अपनी पसंद व्यक्त करने और आवश्यकता पड़ने पर राजनीतिक परिवर्तन का अवसर भी मिलता है। इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया ने असंतोष की अभिव्यक्ति के लिए संस्थागत रास्ते उपलब्ध कराए हैं। यह भी एक संभावित कारण है कि विदेशों में दिखाई देने वाली आक्रामक युवा प्रतिक्रिया भारत में उसी व्यापक स्वरूप में विकसित नहीं हो सकी।
हालाँकि राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह आत्मसंतोष का विषय नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में जनता का विश्वास स्थायी नहीं, बल्कि निरंतर अच्छे कार्य, पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जवाबदेही से अर्जित होता है। बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, किसानों की आय, स्वास्थ्य सेवाएँ, महँगाई और युवाओं के भविष्य जैसे प्रश्न आज भी गंभीर हैं। इन विषयों पर केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं; इनके समाधान के लिए ठोस नीतियाँ, प्रभावी क्रियान्वयन और परिणामों की सार्वजनिक जवाबदेही आवश्यक है। लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि उपलब्धियों के साथ कमियों पर भी खुलकर चर्चा हो और असहमति को व्यवस्था के लिए खतरा नहीं, बल्कि सुधार का अवसर माना जाए।
दूसरे देशों के आंदोलनों से भारत को सीखने की आवश्यकता है, लेकिन उनकी परिस्थितियों की नकल करने की नहीं। सत्ता परिवर्तन अपने आप में समस्याओं के समाधान की गारंटी नहीं होता। किसी भी आंदोलन की वास्तविक सार्थकता इस बात से निर्धारित होती है कि उसके बाद नागरिकों के जीवन में कितना सुधार आया, संस्थाएँ कितनी मजबूत हुईं और युवाओं को कितने नए अवसर प्राप्त हुए। विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन विरोध के साथ वैकल्पिक दृष्टि, रचनात्मक सोच और जिम्मेदारी का भाव भी उतना ही आवश्यक है।
भारत की युवा शक्ति को केवल राजनीतिक विरोध की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक के रूप में देखना चाहिए। यही पीढ़ी अनुसंधान, नवाचार, उद्यमिता, विज्ञान, शिक्षा, सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से देश की दिशा बदल सकती है। आज आवश्यकता ऐसे वातावरण की है जहाँ युवाओं के विचारों को सम्मान मिले, उनकी प्रतिभा को अवसर मिले और राजनीतिक नेतृत्व उनकी आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील तथा जवाबदेह रहे।
अंततः किसी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वहाँ कितने आंदोलन हुए या कितनी सरकारें बदलीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि नागरिकों का जीवन कितना बेहतर हुआ, युवाओं को कितने अवसर मिले, सामाजिक विश्वास कितना मजबूत हुआ और लोकतांत्रिक संस्थाएँ कितनी उत्तरदायी बनीं।
भारत की विशिष्टता केवल उसकी स्थिरता में नहीं, बल्कि स्थिरता के साथ परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता में है। हमें ऐसा लोकतंत्र चाहिए जहाँ सरकार को उसके कार्यों के लिए समर्थन मिले, कमियों पर प्रश्न पूछे जाएँ, युवाओं की आवाज सुनी जाए और नेतृत्व अपनी जिम्मेदारी का निरंतर निर्वहन करे। क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि विचार परिवर्तन, जिम्मेदार नेतृत्व और जागरूक नागरिकता से निर्मित होता है।
— राकेश चन्द्र शुक्ला
सामाजिक एवं पर्यावरण चिंतक
