गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ढूँढ़ता जिसको फिरा आसमान में तू वही है।
झाँका जो दिल में तो मेरे प्राण में तू वही है।।

उड़ता फिरा मैं तो बिना अपनी पहचान के।
अब जो समझा तो मेरी जान में तू वही है।।

तू घुला है हवाओं में पूछूँ तो किससे मैं।
सोचता हूँ तो मेरे हर ध्यान में तू वही है।।

बाहर तराशा तुझे भीतर कभी देखा नहीं।
आईना कहता बोला मेरे विज्ञान में तू वही है।।

अब न भय है मुझे पाने-खोने का सुनो।
भेद मिटा अब तो मेरे ध्यान में तू वही है।।

सबमें तू कण-कण जल-थल में तू।
हर सजे अरमान में तू वही है।।

वेद में, ऋचा में गहराई में रमा है तू।
गूँजता जो मंत्रों के गान में तू वही है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

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