चित्रकूट महिमा राम वन गमन
मध्य प्रदेश है हृदय देश का और मैं उसका वासी हूँ,
चित्रकूट के हैं समीप, मैं पिंडरा गाँव निवासी हूँ।
वैसे तो है जिला मेरा सतना, तहसील मझगवाँ है,
पर मेरे दिल के करीब तो चित्रकूट की महिमा है।
चित्रकूट की महिमा का मैं वर्णन गाने निकला हूँ,
राम-लखन, सीता मैया की कथा सुनाने निकला हूँ।
ग्यारह वर्ष व्यतीत किए और चित्रकूट में वास किया,
यह पावन-पुनीत धरती है, जिसमें प्रभु ने वास किया।
दशरथ के थे पुत्र और कौशल्या माँ के जाए थे,
किन्तु न लक्ष्मण, भरत-शत्रुघ्न, लगते उन्हें पराए थे।
दशरथ जी ने कैकेयी को वचन दिया था कुछ ऐसा,
निःसंकोच कह देना तुम, दो वर दूँगा तुम्हें तब वैसा।
पहले मन में कपट न था, न राम पे कोई शंका थी,
“आग में जिसने घी डाला” वह दासी एक मंथरा थी।
राम के प्रति जो ममता थी, कर षड्यंत्र निकाल दिया,
कान भरे कैकेयी के, कानों में लावा डाल दिया।
तेरा बेटा भरत है तो फिर राज्य राम को क्यों देना?
राज्याभिषेक भरत का कर, राम से क्या लेना-देना?
ऐसा सुनते ही कैकेयी जलहीन मीन-सी तड़प उठी,
सारी ममता क्षीण हुई, सीने में ज्वाला धधक उठी।
तब दशरथ के पास गई और अपना वचन सुना डाला,
राम को दो वनवास, भरत को घोषित कर दो तुम राजा।
इतना सुनते दशरथ के मानो प्राण-पखेरू छूट गए,
जो अरमान सजाए थे, वे एक-एक करके टूट गए।
तब नियति से मजबूर पिता ने एक फरमान सुना डाला,
वचनप्रिय दशरथ ने बेटे को वनवास सुना डाला।
पिता की आज्ञा मान राम ने वन जाना स्वीकार किया,
एक पल भी न रुके राम और न कोई प्रतिकार किया।
लखन लाल भी बोले तब और मात जानकी बोल उठीं,
मुखमंडल पर मुस्कान सजाई और अधरों को खोल उठीं।
स्वामी का वन गमन हुआ तो महलों में नहीं रह सकती,
जनक दुलारी और रघुकुल की वधू यह नहीं सह सकती।
लखन लाल भी बोले कि वन जाना है स्वीकार मुझे,
भइया की सेवा करने का हर पल है अधिकार मुझे।
भगवा वस्त्र सुसज्जित कर कैकेयी थाल सम्मुख लाई,
पहनाया तीनों को और फिर कुटिल काल-सी मुस्काई।
गुरु वशिष्ठ की आज्ञा ली और मात-पिता को नमन किया,
संन्यासी का वेश धरा और वैसा ही आचरण किया।
महलों से वन गमन के खातिर जब प्रभु ने प्रस्थान किया,
प्रजा ने रस्ता रोक रखा था, हर संभव व्यवधान किया।
प्रजा के पालक रामचंद्र जो बसे हुए थे तन-मन में,
राम-राम के जयकारे थे, राम रमे थे जन-जन में।
गतिरोधक से गड़े हुए थे, राम-सम्मुख अड़े हुए थे,
कुछ तो अनुनय-विनय कर रहे, कुछ रथ-सम्मुख पड़े हुए थे।
लाख जतन और यतन कर रहे, राम कहाँ झुकने वाले,
पिता की ही आज्ञा है तो फिर राम कहाँ रुकने वाले।
एक-एक समझाया और प्रजा का ढाढ़स बँधवाया,
सबको दी सांत्वना और फिर हाथ जोड़कर समझाया।
जाने दो मुझको, मत रोको, चौदह वर्ष बिताना है,
प्रेमपूर्वक विदा करो, फिर लौट के वापस आना है।
राम की अनुनय-विनय सुनी और सब मन ही मन मुसकाए,
दसों दिशाएँ गूँज उठीं, सब राम-राम ही चिल्लाए।
आर्य सुमंत रथ हाँक रहे थे, सबके सब मुँह ताक रहे थे,
महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग खिड़की से अपनी झाँक रहे थे।
आगे-आगे रथ चला और पीछे रघुकुल की प्रजा चली,
बच्चे, बूढ़े और जवान पीछा करते रहे गली-गली।
धीरे-धीरे चलते आए सब तमसा नदी किनारे तक,
और प्रजा के सम्मुख अपने श्रीराम भी हारे तब।
सबको सोता छोड़ प्रभु ने अर्धरात्रि प्रस्थान किया,
शीश झुकाया, नमन किया, प्रभु ने सबका सम्मान किया।
रथ ले चले सुमंत और फिर कौशल प्रदेश सीमा आई,
नमन मेरा स्वीकार करो, हे जननी जन्मभूमि माई।
— विशेष सिन्हा ‘विशेष’
