यादों के वो पन्ने, नीले काग़ज़ में सिमटी मुकम्मल दुनिया
आज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले ख़त किसी अनमोल धरोहर की तरह महसूस होते हैं। वे महज़ कागज़ के टुकड़े नहीं थे, बल्कि भावनाओं के ऐसे जीवंत पुल थे जो मीलों दूर बैठे अपनों को एक-दूसरे के दिल के पास ले आते थे। उन ख़तों को लिखने का एक ख़ास ‘सलीक़ा’ होता था,वे केवल शब्द नहीं, बल्कि एक संस्कार थे। ख़त की शुरुआत श्रद्धा के साथ ‘बड़ों के चरण स्पर्श’ से होती थी और अंत स्नेहिल ‘कुशलता की कामना’ पर। इन औपचारिकताओं के बीच जो हिस्सा बचता था, उसमें सजी होती थी ‘पूरी ज़िंदगी’।
उस एक छोटे से लिफ़ाफ़े में गाँव के खेत-खलिहानों की गंध, घर के आंगन की चिंता और भविष्य के सपने एक साथ सांस लेते थे। उसी कागज़ पर घर में आए नन्हे मेहमान की ‘खुशख़बरी’ मुस्कराती थी, तो कहीं कोने में माँ की बीमारी का ‘दर्द’ और आर्थिक तंगी से उपजा ‘अनुनय’ (प्रार्थना) भी छिपा होता था। जब फ़सलें ख़राब होती थीं, तो किसान पिता का सारा दुख़ उस स्याही के ज़रिए परदेस में बैठे बेटे तक पहुँच जाता था। वह नीला कागज़ एक साथ कई भूमिकाएँ निभाता था—वह माँ की आस था, पिता का संबल था और बच्चों के स्वर्णिम भविष्य की पटकथा था।
विशेष रूप से फ़ागुन के उन रूमानी दिनों में, इन ख़तों की अहमियत और बढ़ जाती थी। जब हवाओं में महुआ की महक घुलती, तब कोई ‘नवयौवना’अपने प्रिय का ख़त पाकर उसे दुनिया की नज़रों से छिपाकर अपने सीने से लगा लेती थी। उन बंद लिफ़ाफ़ों में ऐसी ‘मोहब्बतें’ छुपी होती थीं, जिन्हें शब्दों में कहना मुमकिन नहीं था,बस अकेले में बहते आँसू और आँखों की चमक ही उन एहसासों की गवाह बनती थी। गाँव की चौपाल पर जब ‘डाकिया’ आता, तो वह किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लगता था। अनपढ़ लोग, जो अक्षर नहीं पहचानते थे, वे भी उस ख़त को बार-बार छूकर और उसकी ख़ुशबू को महसूस कर अपनों के हाल पढ़ लेते थे। आज संचार के साधन तो बहुत बढ़ गए हैं, लेकिन वह जो ‘स्पर्श’और ‘ठहराव’ उन चिट्ठियों में था, वह अब इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गया है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज़
