कविता

सावन

चाहत मेरी संग तुम्हारे झूला झूलूँ,
पेंग बढ़ाकर संग तुम्हारे नभ को छू लूँ।

रिमझिम बारिश की बूँदें, पीपल की शीतल छाँव,
सावन में अमुवा पर झूला, जब सखियों की होती ठाँव।

सखियों संग तेरी झूलना, जलन मुझे बहुत होती है,
सावन में सजनी बाहों में, साजन की चाहत होती है।

सजी हुई हो हाथ तुम्हारे सुन्दर मेंहदी,
दमक रही माथे की बिंदिया छू लूँ।

पैरों पर भी सजा आलता, पायल बाजे,
रूप की रानी आज तुम्हारे रूप को छू लूँ।

केशों में गजरा, आँखों में कजरा छाया है,
सुर्ख गुलाबी लरजते होठों को छू लूँ।

रूप यौवना मदमस्त कली तुम हिरणी सी,
मृगनयनी चित्तचोर तुम्हारे पग को छू लूँ।

सजा हुआ माथे पर टीका दमक रहा है,
मांग भरा सिन्दुर तुम्हारे माथे को छू लूँ।

— डॉ अ कीर्तिवर्द्धन

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