कविता

हरड़ का पुराना पेड़

घर के आंगन में है एक हरड़ का पेड़
बड़ी बड़ी हरड़े लगती हैं बहुत दूर
कई वर्षों से खड़ा एक कोने में
गर्मियों में छाया देता है भरपूर

सर्दियों में कर देते हैं उसकी छंटाई
ताकि धूप आंगन में आ जाए
पुराने पेड़ हो गए धीरे धीरे खत्म
हरियाली तभी बढ़ेगी जब कोई नए पौधे लगाए

बुजुर्ग करते थे बहुत समझदारी का काम
हरड़ भेड़ा और आमला तीनों हैं लगाए
बनता है त्रिफला चूर्ण इन तीनों का
हाजमा हो जाये सही पेट के रोगों से मुक्ति दिलाए

कई पक्षियों का जमघट लगा रहता है उस पर
चिड़ियां तो पूरा दिन चहक चहक कर शोर मचाती हैं
दाना चुगने के लिए उतरती हैं आंगन में झुंड में
अंदर से कोई निकलता है तो झट भाग जाती हैं

शाम होते ही पक्षियों की सुनाई देती हैं आवाजें
खाने के लिए मुंह खोलते चूज़े नज़र हैं आते
पूरा दिन करते हैं इंतज़ार अपनी मां का
चीं चीं की आवाज से पूरा वातावरण हैं गुंजाते

अम्मा बैठी रहती है उस पेड़ के नीचे ब्यूह के ऊपर
रहता है हमेशा उसका रास्ते से आने जाने वालों पर ध्यान
हर आने जाने वाला करता है उनसे खूब बातें
पास आकर करते हैं बात देते हैं सब बहुत इज़्ज़त मान

कभी जमघट लगा रहता था यहां इंसानों का
आंगन भरा रहता था बच्चों और घरवालों से
बुजुर्गों की दमदार आवाजें गूंजती थी जहां
आज दुखी हैं दरवाजे उनपर लटके बड़े बड़े तालों से

वीरान पड़ा है आंगन अब लगे रहते हैं पत्तों के ढेर
लगता है कभी कभी जैसे देख रहा है दूर से आसमान
जा रहे सब धीरे धीरे अपनी भी आएगी बारी एक दिन
सामने कोई नहीं बस दिखते हैं उनके कदमों के निशान

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र

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