अपनों की बेरुख़ी
सारे दुःख जो सह गया, बनकर दृढ़ इंसान।
पर अपनों की बेरुख़ी, ले बैठी मुस्कान॥
जीवन भर जो बाँटता, सबको अपना नेह।
अपने आँखें फेर लें, सूख गया सब मेह॥
घाव समय भर दे सदा, मन रहता सुनसान।
पर अपनों की बेरुख़ी, ले बैठी मुस्कान॥
दुनिया के हर दर्द को, हँसकर लिया सँभाल।
अपनों के दो शब्द ने, कर डाला बेहाल॥
बाहर दिखता दृढ़ बहुत, भीतर है तूफ़ान।
पर अपनों की बेरुख़ी, ले बैठी मुस्कान॥
धन-दौलत सब व्यर्थ है, यदि न मिले विश्वास।
अपने ही जब दूर हों, कैसा फिर उल्लास॥
प्रेम भरा व्यवहार ही, जीवन की पहचान।
पर अपनों की बेरुख़ी, ले बैठी मुस्कान॥
रिश्तों का आधार है, स्नेह, दया, सम्मान।
इनसे ही घर-आँगन में, बसता है भगवान॥
जिसने अपने खो दिए, खो बैठा अरमान।
पर अपनों की बेरुख़ी, ले बैठी मुस्कान॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
