उफ्फ्फ! यह चाय
आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।
कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।
— सविता सिंह मीरा
आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।
कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।
— सविता सिंह मीरा